महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के मतदान से पहले ही नए राजनीतिक समीकरण उभरकर सामने आ चुके हैं। निकाय चुनावों के नतीजों के बाद हालात और तेजी से बदलेंगे। इन चुनावों से न केवल राज्य की राजनीति प्रभावित होगी बल्कि केंद्र की सियासत को भी नई दिशा मिल सकती है।
मुंबईः महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के मतदान से पहले ही नए राजनीतिक समीकरण उभरकर सामने आ चुके हैं और नतीजों के बाद हालात और तेजी से बदलेंगे। इन चुनावों से न केवल राज्य की राजनीति प्रभावित होगी बल्कि केंद्र की सियासत को भी नई दिशा मिल सकती है। महाराष्ट्र में गठबंधन बनते बिगड़ते नजर आएंगे। निकाय चुनावों से पहले ही I.N.D.I.A. ब्लॉक की हालत बेहद नाजुक हो चुकी है। दूसरी ओर, एनडीए के घटक दल भले ही कई जगहों पर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे है, लेकिन इसके टूटने की आशंका नहीं दिख रही।
15 जनवरी को महाराष्ट्र में चुनाव
महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं के लिए 15 जनवरी को मतदान होना है। कई महानगरपालिकाओं में सत्तारूढ़ महायुति के घटक दल बीजेपी, शिंदे सेना और अजित पवार की एनसीपी एक-दूसरे के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। वहीं विपक्षी महाविकास आघाड़ी (कांग्रेस, उद्धव सेना, एनसीपी-एसपी, समाजवादी पार्टी और अन्य दल) पहले ही बिखर चुके हैं। राज ठाकरे को साथ लेने के कारण कांग्रेस ने उद्धव ठाकरे से दूरी बना ली, जबकि समाजवादी पार्टी अलायंस से बाहर हो चुकी है। विपक्ष पूरी तरह बिखरा नजर आ रहा है।
बीएमसी का विशेष महत्व
महाराष्ट्र की राजनीति में मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) का विशेष महत्व है। करीब 75 हजार करोड़ के बजट वाली बीएमसी पर ठाकरे परिवार 25 वर्षों से काबिज है। ऐसे में यह चुनाव ठाकरे परिवार के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अगर बीएमसी हाथ से निकलती है तो ठाकरे परिवार की राजनीति की राह बेहद कठिन हो जाएगी। इसी वजह से उद्धव ठाकरे ने पुरानी कड़वाहट भुलाकर राज ठाकरे से हाथ मिलाया है। हालांकि, बीजेपी और शिंदे सेना बीएमसी और ठाकरे परिवार के बीच दीवार की तरह खड़ी दिख रही है।
ठाकरे परिवार में दूरियां कम हुई
इन चुनावों ने ठाकरे परिवार के बीच की दूरियां कम जरूर की है। लेकिन यह रिश्ता लंबे समय तक टिकेगा या नहीं, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों को संदेह है। उधर, I.N.D.L.A. ब्लॉक के प्रमुख दल कांग्रेस को राज ठाकरे से राजनीतिक एलर्जी है। अगर भविष्य में महाविकास आघाड़ी या I.N.D.I.A. में राज ठाकरे को शामिल करने की बात आती है, तो कांग्रेस के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। राज ठाकरे को हिंदी और उत्तर भारतीय विरोधी माना जाता है, ऐसे में उन्हें साथ लेने पर कांग्रेस को हिंदी भाषी राज्यों में जवाब देना मुश्किल पड़ सकता है।
कौन दे रहे चुनौती ?
चुनाव के दौरान बने नए राजनीतिक समीकरणों में सबसे अहम संकेत शरद पवार और अजित पवार के बीच जमी बर्फ पिघलने के रूप में मिला है। पुणे और पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका में दोनों गुट मिलकर बीजेपी को चुनौती दे रहे है। अनुमान है कि नतीजों के बाद दोनों गुटों का विलय हो सकता है। ऐसा होने पर शरद पवार और सुप्रिया सुले की एनसीपी सीधे केंद्र और राज्य की सत्ता समीकरणों में शामिल हो जाएगी। इसका असर राज्य और केंद्र की राजनीति पर पड़ेगा।
