भारत में अंग्रेजों का सबसे बड़ा अड्डा बंगाल की धरती पर कोलकता बना। कोलकता से ही उन्होंने भारत में केवल सामरिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक एवं बौद्धिक दुष्चक्र की रचना की।
ईसाई बेपटिस्ट चर्च का भारत में सबसे पहला मिशन सेरामपुर (श्रीरामपुर) मिशन हुगली मे स्थापित हुआ, जिसने बंगाल में शिक्षा और सामाजिक सुधार के नाम पर हिन्दू मानस को प्रभावित करने का कार्य किया। सन् 1800 में स्थापित अपने प्रिंटिंग प्रेस में भारतीय भाषाओं में पहली बंगाली बाइबिल का प्रकाशन किया। 1818 में सेरामपुर कालेज की स्थापना कर इसके तीन संस्थापक विलियम कैरी, जोशुआ मार्शमैन और विलियम वार्ड ने केवल बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे भारत के धर्मशास्त्रीय शिक्षा को प्रभावित किया। यही वह केन्द्र था जो समाज सुधार के नाम पर बंगाली भद्रलोक के मानस को दिग्भ्रमित किया। इसके पूर्व सन् 1784 में विलियम जोन्स द्वारा स्थापित एशियाटिक सोसाइटी हिन्दू धर्मशास्त्रों की अपने अनुकूल व्याख्या करने में लगी हुई थी। इन दोनों संस्थाओं ने भारत के एक विशेष वर्ग पर गहरा प्रभाव डाला।
लेकिन वह बंगाल की ही धरती थी जिसने इस आक्रमण का मुंहतोड़ बौद्धिक प्रत्युत्तर भी दिया। ईसाई मिशनरियों द्वारा मूर्तिपूजा के प्रचण्ड विरोध के काल में बंगाल की ही वह धरती थी जहाँ वंकिम ने ‘वंदे मातरम्’ के माध्यम से भारत माँ का मूर्तिमंत स्वरूप खड़ा कर दिया।
मूर्तिपूजा के खण्डन के उस काल में ही श्रीरामकृष्ण ने साक्षात् माँ भगवती का दर्शन कर अपने साधना की अवस्था से बड़े-बड़े अंग्रेजों को नतमस्तक होने के लिए विवश कर दिया।
यही नहीं मूर्तिपूजक होकर भी अद्वैत वेदान्त के अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न शिष्य के रूप में स्वामी विवेकानन्द को खड़ा कर पूरे विश्व के सामने साकार और निराकार के परस्पर सामंजस्य के हिन्दू वैचारिकी का शंखनाद करा दिया।
यह वह समय था जब पूरे विश्व की शक्तियाँ हिन्दू अभिधान को लांक्षित करने में लगी थीं तब विश्व के सामने खड़ा होकर ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ का उद्घोष करने वाले स्वामी विवेकानन्द बंगाल की धरती पर ही जन्म लिए थे। विवेकानन्द से पहले किसी ने भी हिन्दू होने पर गर्व का उद्घोष नहीं किया था। हिन्दू महत्ता, गरिमा और गौरव का बोध बंगाल की धरती से ही हुआ था।
अपने अद्वितीय प्रतिभा, मेधा और बौद्धिकता के बाद भी बंगाल एक गहरे बौद्धिक आक्रमण का शिकार हुआ, जिसका लाभ उठा कर वामपंथ ने अपनी जड़ें जमाई। वामपंथ को उखाड़ फेंकने के बाद भी एक गौरवशाली हिन्दू के रूप में अपनी पहचान को स्वीकार करने में बंगाल पंद्रह वर्षों तक झिझकता रहा, लेकिन अब वह अपने हिन्दू गौरव को आत्मसात् करने के लिए तैयार हो गया है।
अब बंगाल भगवती का दर्शन विपिन चन्द्र पाल द्वारा वर्णित जगज्जननी, जगद्धात्री और जगत्संहारकारिणी के रूप में साक्षात् भारत माता के विग्रह स्वरूप में करने के लिए आतुर है। महर्षि अरविन्द की धरती साक्षात् चैतन्य स्वरूपा शक्ति का साक्षात्कार कर भारत माता के अखण्ड विग्रह का दर्शन करना चाहती है। यह तो अभी सुगबुगाहट है, भविष्य का बंगाल अब हिन्दू गौरव के साथ जागने के लिए व्याकुल है। एशियाटिक सोसाइटी से लेकर सेरामपुर मिशन तक की विकृतियों से ढके हुए मानस को प्रक्षालित कर बंगाल की धरती “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं” का पुनः उद्घोष कर केवल बंगाल ही नहीं भारत का नेतृत्व करने के लिए प्रतिबद्ध हो रही है।
