Andaman and Nicobar project: अंडमान और निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से मलक्का स्ट्रेट से मलक्का स्ट्रेट सिर्फ 500-600 किलोमीटर दूर है। जबकि अंडमान-निकोबार का सबसे दक्षिणी छोर इंदिरा पॉइंट, जो ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है, मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार के बेहद करीब है।
बीजिंग/नई दिल्ली: डोनाल्ड ट्रंप डेनमार्क से ग्रीनलैंड छीनकर उत्तरी व्यापारिक कॉरिडोर से चीन के प्रभुत्व को खत्म करना चाह रहे हैं। ट्रंप जिस आक्रामकता के साथ ग्रीनलैंड छीनने की तरफ बढ़ रहे हैं, उतना ही तेज दबाव बंगाल की खाड़ी में गहराता जा रहा है। इस क्षेत्र में भारत अपने विशाल अंडमान निकोबार डेवलपमेंट प्रोजेक्ट, खासकर ग्रेट निकोबार द्वीप प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। लेकिन इस प्रोजेक्ट को रोकने की काफी कोशिशें की जा रही हैं।
अचानक से दर्जनों एक्टिविस्ट, पर्यावरणविद और यहां तक की कई राजनेता भी इस प्रोजेक्ट के विरोध में उकर आए हैं। ये शोर करीब 30 साल पहले भारत के के न्यूक्लियर प्रोग्राम के समय हुए हंगामे की याद दिलाता है। इसीलिए सवाल उठ रहे हैं कि आखिर वो कौन है, जो भारत के इस मेगा प्रोजेक्ट से डर रहा है? किसके इशारे पर इस प्रोजेक्ट को लेकर गलतफहमी फैलाने की कोशिश हो रही है और कौन है जो देश की सुरक्षा से खतरनाक साजिश रच रहा है।
बहुत छोटे से उदाहरण के साथ समझा जाएं तो आज देश में लड़ाकू विमानों की जो कमी है, उसके लिए आज से 30-40 साल पहले की उदासीनता जिम्मेदार है। उसी तरह से अगर आज अंडमान निकोबार के क्षेत्र में अगर ऐसे प्रोजेक्ट नहीं लाए गये, तो आज से 25-30 सालों के बाद हम यही पूछ रहे होंगे, कि जब चीन का खतरा मालूम था, तो समय रहते प्रोजेक्ट क्यों शुरू नहीं किए गये? इसीलिए आज की तारीख में मजबूती से सवाल उठाना जरूरी है कि वो कौन हैं जो इस प्रोजेक्ट को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, या इस प्रोजेक्ट को लेकर अड़ंगा डालने की कोशिश कर रहे हैं? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें इस प्रोजेक्ट को समझना होगा।

अंडमान से मलक्का स्ट्रेट को ब्लॉक कर सकता है भारत
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?
ग्रेट निकोबार आइलैंड (GNI) प्रोजेक्ट को 2021 में नीति आयोग ने शुरू किया था। इसका मकसद एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT), एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एक टाउनशिप और एक गैस-सोलर पावर प्लांट बनाना है, जिसे ANIIDCO लागू करेगा। ऊपर से देखने पर ये डेवलपमेंटल प्रोजेक्ट लग सकते हैं, लेकिन असल ये ‘डुएल यूज’ प्रोजेक्ट हैं। यानि, जो एयरपोर्ट बन रहा है, जो बंदरगाह बनेगा, उसका सैन्य इस्तेमाल हो सकता है।
इससे भारत की ना सिर्फ सिंगापुर और कोलंबो पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी, बल्कि मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य में हमारी सर्विलांस काफी ज्यादा मजबूत हो जाएगी। मलक्का, ये वो संकरा समुद्री रास्ता है, जिसे चीन सबसे ज्यादा डरता है। भारत अंडमान-निकोबार से युद्ध के समय चीन के सप्लाई चेन को ब्लॉक कर सकता है, जिससे चीन का करीब 80 प्रतिशत कारोबार ही ठप पड़ जाएगा और इसीलिए चीन इस प्रोजेक्ट से खौफजदा है।
अंडमान और निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से मलक्का स्ट्रेट से मलक्का स्ट्रेट सिर्फ 500-600 किलोमीटर दूर है। जबकि अंडमान-निकोबार का सबसे दक्षिणी छोर इंदिरा पॉइंट, जो ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है, मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार के बेहद करीब है। यहां से इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप की दूरी सिर्फ 140-160 किलोमीटर है। जबकि, ग्रेट निकोबार से मलक्का स्ट्रेट की मुख्य शिपिंग लेन सिर्फ 75-80 किलोमीटर दूर है। यानि समझ सकते हैं कि भारत अगर इस क्षेत्र में सैन्य शक्ति बढ़ाता है, तो किसके पेट में दर्द शुरू हो सकता है।
अंडमान और निकोबार की स्थिति अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) पर टिकी है, जो भारत की एकमात्र त्रि-सेवा थिएटर कमांड है। यहां भारत के कुछ महत्वपूर्ण नौसेना बेस हैं, जैसे INS बाज और INS उत्कर्ष। इससे भारत पूर्वी हिंद महासागर में निगरानी और ऑपरेशन चलाता है। यानि, निकोबार का बेस शांति के समय कारोबार को बढ़ाएगा और युद्ध के समय सैन्य फायदा दिलाएगा। मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री चोकपॉइंट में से एक है, जिससे बड़ी शक्तियों को भारत की ताकत का अहसास होता है और वो डरते हैं।
प्रोजेक्ट को रोकने के लिए क्या दलील दी जा रही?
इस प्रोजेक्ट को रोकने के लिए द्वीपसमूह की इकोलॉजिकल कमजोरी और GNI प्रोजेक्ट का पर्यावरण और स्थानीय आदिवासी समुदाय पर पड़ने वाले प्रभाव को उठाया जाता है। इन्हें मुद्दा बनाकर मुकदमेबाजी हो सकती है, पर्यावरण विद हंगामा मचा सकते हैं, ऐसे संगठन अंतर्राष्ट्रीय जांच की मांग कर सकते हैं, ताकि बाहरी शक्तियों को इस क्षेत्र में दखल देने का रास्ता खुले और इस प्रोजेक्ट में लगने वाले फंड को रोकने के लिए कई तरकीबें आजमा सकते हैं। ताकि इस प्रोजेक्ट की रफ्तार को धीमा किया जा सके।
चीन के नजरिए से देखें तो निकोबार में भारत की मजबूत हवाई और नौसैनिक क्षमता, मलक्का में उसके लिए खतरा है। यद्ध के समय भारत चीन की इस कमजोरी पर सीधा हमला कर सकता है। इसीलिए इस प्रोजेक्ट को लेकर चीन डरा हुआ है। अंडमान और निकोबार का भूगोल बंगाल की खाड़ी के पड़ोस में भारत की समुद्री सीमाओं को मजबूत बनाता है। ये हमें कई देशों की समुद्री सीमा से जोड़ता है, जिनमें बांग्लादेश भी शामिल है।
अंडमान निकोबार द्वीप समूहों का भारत का ‘कभी नहीं डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर‘ कहा जाता है। ये भारत को हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में एक ऐसी शक्ति क्षमता देते हैं, जिससे पाकिस्तान और चीन जैसे डरे हमेशा खौफ में रखते हैं। इसीलिए पाकिस्तान और चीन जैसे देश इस प्रोजेक्ट को लेकर नैरेटिव फैलाने की कोशिश करते हैं।
वहीं, बांग्लादेश, जो भारत से सैन्य शक्ति के मामले में उलझ नहीं सकता है, वो चीन और पाकिस्तान की शह पर उस नैरेटिव को बढ़ाता है। वो बंगाल की खाड़ी को लेकर हल्ला इसीलिए मचाता है, ताकि अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को कह सके, कि भारत इस क्षेत्र में प्रेशर बना रहा है। जैसे भारत इस पूरे क्षेत्र को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है।
भारत का ये प्रोजेक्ट 10 अरब डॉलर से ज्यादा है और अमेरिका भी इस प्रोजेक्ट को भारतीय नौसेना की बड़ी क्षमता मानता है, इसीलिए अमेरिका के एक्टिविस्ट अंतर्राष्ट्रीय अखबारों में इस प्रोजेक्ट के खिलाफ खूब लिख रहे हैं। लेकिन भारत के लोगों को देश की सुरक्षा के लिए इस सैन्य प्रोजेक्ट के साथ खड़ा रहना चाहिए और ऐसे तत्वों का विरोध करना चाहिए, जो गलतफहमी फैला रहे हैं। हो सकता है, पर्यावरण को लेकर कुछ खतरें हों, लेकिन एक बात हमेशा याद रखने की जरूरत है कि देश हित से बढ़कर कुछ नहीं है और दुनिया का कौन सा देश अपने हित के लिए पर्यावरण की परवाह कर रहा है?
Like this:
Like Loading...