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बुद्ध पूर्णिमा विशेष -“अप्प दीपो भव” – अपना दीपक खुद बनो,करुणा, ज्ञान और सामाजिक सद्भाव

*बुद्ध पूर्णिमा ०१ मई २०२६*
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🙏🙏*भगवान बुद्ध:-*🙏🙏
 करुणा, ज्ञान और सामाजिक सद्भाव
 
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
भगवान गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी, नेपाल में क्षत्रिय शाक्य कुल में हुआ। बचपन का नाम सिद्धार्थ था। पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के राजा थे, माता मायादेवी थीं।
जन्म के 7 दिन में ही माता का निधन हो गया। मौसी गौतमी ने पाला, *इसलिए ‘गौतम’ कहलाए*
 
ज्योतिषियों ने कहा – या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेंगे या संन्यासी।
       पिता ने दुख से दूर रखने के लिए महल में रखा। यशोधरा से विवाह, पुत्र राहुल का जन्म हुआ।
 
*चार दृश्य और महाभिनिष्क्रमण*  
29 वर्ष की आयु में नगर भ्रमण पर सिद्धार्थ ने चार दृश्य देखे – बूढ़ा, रोगी, मृतक और संन्यासी। दुख देखकर वैराग्य हुआ। उसी रात राहुल और यशोधरा को सोता छोड़कर *महाभिनिष्क्रमण* कर दिया।
 
तपस्या और बोधि प्राप्ति
6 साल उरुवेला ( बिहार- बोधगया में )में कठोर तप किया। शरीर हड्डी रह गया।
    तब *मध्यम मार्ग* समझा। सुजाता की खीर खाई। बोधगया में पीपल के नीचे 49 दिन की समाधि के बाद वैशाख पूर्णिमा को *बोधि* मिली।
 सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ – जागे हुए – कहलाए।
 
धर्मचक्र प्रवर्तन:
           चार आर्य सत्य
सारनाथ में 5 शिष्यों को पहला उपदेश दिया: –
1– दुख है, 2– दुख का कारण तृष्णा है, 3– दुख का अंत संभव है, 4– अष्टांगिक मार्ग ही उपाय है।
 
अष्टांगिक मार्ग
   सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति, समाधि।
 
सामाजिक सद्भाव के लिए भगवान बुद्ध का संदेश
बुद्ध का सबसे बड़ा काम था – *जाति, ऊँच-नीच, भेदभाव की दीवारें तोड़ना। 
 समाज के सभी वर्णों और स्त्रियों को धर्म में, आदर सहित बराबरी का अवसर प्रदान किया।
जाति प्रथा का खंडन: “न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो” – जन्म से कोई शूद्र या ब्राह्मण नहीं होता, कर्म से होता है। उन्होंने नाई विनयधर उपालि को भिक्षु संघ में वरिष्ठ स्थान दिया और राजा भी उसे प्रणाम करते थे।
स्त्री समानता: –
   भगवान बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर मां महाप्रजापति गौतमी को पहला भिक्षुणी संघ स्थापित करने दिया। आम्रपाली जैसी नगरवधू को भी संघ में सम्मान मिला।
सभी के लिए धर्म: बुद्ध का धम्म राजा से लेकर चांडाल तक सबके लिए था। अंगुलिमाल डाकू को भी भिक्षु बनाकर सुधार दिया। कहा – 
– “सबके आँसू का स्वाद एक है, सभी का रक्त लाल है।”
अहिंसा और मैत्री भाव
  कहा – “सब्बे सत्ता सुखी होंतु” – सभी प्राणी सुखी हों। 
       कोसल के राजा प्रसेनजित और मगध के बिंबिसार जैसे शत्रु राजाओं में मित्रता कराई।
 
संघ : 
– भिक्षु संघ में हर निर्णय वोट से होता था। कोई बड़ा-छोटा नहीं। 
 
भाषा : बुद्ध ने उपदेश संस्कृत की जगह *पाली* – भाषा – में दिए। ताकि गरीब-अनपढ़ भी समझे। भाषा का भेद मिटाया।
 
भंडारा परंपरा और करुणा 
बुद्ध ने ‘पिंडपात‘ दिया – भिक्षु घर-घर थोड़ा भोजन लेते थे ताकि दाता पर बोझ न पड़े। सुजाता की खीर पहला प्रसाद है। 
सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा त्यागकर जगह-जगह अन्नसत्र खुलवाए।
 दान पारमिता
भूखे को भोजन देना सबसे बड़ा पुण्य बताया। आज भी ‘कठिन चीवर दान’ पर बौद्ध देशों में विशाल भंडारे होते हैं।
 
महापरिनिर्वाण  
80 वर्ष की आयु, 483 ई.पू. कुशीनगर में अंतिम भोजन किया। 
शाल वृक्षों के बीच कहा – 
“अप्प दीपो भव” – अपना दीपक खुद बनो। 
फिर *महापरिनिर्वाण* हुआ।
 
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि।
 
संकलित 
अरुण
राष्ट्रीय सचिव धर्म संस्कृति संगम