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जन्म दिन विशेष :केरल में धर्मरक्षक स्वामी सत्यानन्द सरस्वती

25 सितम्बर/जन्म-दिवस
केरल में धर्मरक्षक स्वामी सत्यानन्द सरस्वती

केरल भारत का ऐसा तटवर्ती राज्य है, जहां विरोधी शक्तियां मिलकर हिन्दू अस्मिता को मिटाना चाहती हैं। यद्यपि वहां के हिन्दुओं में धर्म भावना असीम है; पर संगठन न होने के कारण उन्हें अपमान झेलना पड़ता है। जातिगत भेदभाव की अत्यधिक प्रबलता के कारण एक बार स्वामी विवेकानन्द ने केरल को पागलखाना कहा था। इसके बाद भी अनेक साधु सन्त वहां हिन्दू समाज के स्वाभिमान को जगाने में सक्रिय हैं।

25 सितम्बर, 1933 को तिरुअनन्तपुरम् के अंडुरकोणम् ग्राम में जन्मे स्वामी सत्यानन्द उनमें से ही एक थे। उनका नाम पहले शेखरन् पिल्लै था। शिक्षा पूर्ण कर वे माधव विलासम् हाई स्कूल में पढ़ाने लगे। 1965 में उनका सम्पर्क रामदास आश्रम से हुआ और फिर वे उसी के होकर रह गये। आगे चलकर उन्होंने संन्यास लिया और उनका नाम स्वामी सत्यानन्द सरस्वती हुआ।

केरल में ‘हिन्दू ऐक्य वेदी’ नामक संगठन के अध्यक्ष के नाते स्वामीजी अपने प्रखर भाषणों से जन जागरण का कार्य सदा करते रहे। 1970 के बाद राज्य में विभिन्न हिन्दू संगठनों को जोड़ने में उनकी भूमिका अति महत्वपूर्ण रही। वे ‘पुण्यभूमि’ नामक दैनिक पत्र के संस्थापक और सम्पादक भी थे। आयुर्वेद और सिद्धयोग में निष्णात स्वामीजी ने ‘हर्बल कोला’ नामक एक स्वास्थ्यवर्धक पेय बनाया था, जो अत्यधिक लोकप्रिय हुआ।

स्वामी सत्यानन्दजी के मन में केरल के हिन्दू समाज की चिन्ता सदा बसती थी। वे श्री रामदास आश्रम चेंगोट्टूकोणम (तिरुअनन्तपुरम्) के पीठाधिपति तथा विश्व हिन्दू परिषद द्वारा गठित मार्गदर्शक मंडल के सदस्य थे। उन्होंने देश विदेश में अनेक रामदास आश्रमों की स्थापना की। ‘यंग मैन्स हिन्दू ऐसोसियेशन’ तथा ‘मैथिली महिला मंडलम्’ के माध्यम से उन्होंने बड़ी संख्या में हिन्दू परिवारों को जोड़ा। केरल की राजधानी तिरुअनन्तपुरम् में प्रतिवर्ष लगने वाले रामनवमी मेले का प्रारम्भ उन्होंने ही किया।

एक बार मिशनरियों ने केरल के प्रसिद्ध शबरीमला तीर्थ की पवित्रता भंग करने का प्रयास किया। उन्होंने 24 मार्च, 1983 की अंधेरी रात में मन्दिर के मार्ग में ‘नीलक्कल’ नामक स्थान पर सीमेंट का एक क्र१स गाड़ दिया। उनकी योजना वहां एक बड़ा चर्च बनाने की थी, जिससे शबरीमला मन्दिर के दर्शनार्थ आने वाले लाखों तीर्थयात्रियों को फुसलाया जा सके। ऐसा वे पहले भी कई बार कर चुके थे। उन्होंने कहा कि पहली शती का यह क्राॅस खुद ही प्रगटा है। यद्यपि पुरातत्ववेत्ताओं की जांच में यह दावा झूठा सिद्ध हो गया।

पर केरल के हिन्दू संगठन इस बार चुप नहीं रहे। स्वामीजी तथा कुम्मनम् राजेशखरन के नेतृत्व में एक सर्वदलीय समिति बनाकर व्यापक आन्दोलन किया गया। शासन ने आंदोलन दबाने के लिए बल प्रयोग भी किया; पर हिन्दू समाज की उग्रता देखकर उसे पीछे हटना पड़ा। 19 मई को शासन ने वहां एक हेक्टेयर जमीन चर्च को दे दी। इस पर स्वामीजी ने उग्र सत्याग्रह करने की घोषणा कर दी। इससे घबराकर शासन ने दबाव डाला और अंततः 19 अगस्त को वहां से क्राॅस हटा लिया गया। केरल में चर्च के पीछे हटने का यह पहला ही प्रसंग था। स्वामीजी की इस आन्दोलन में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके प्रति सभी साधु संन्यासियों तथा हिन्दू संगठनों में इतना आदर था कि सब थोड़े प्रयास से ही एक मंच पर आ गये।

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण के लिए चले आन्दोलन में भी स्वामीजी बहुत सक्रिय रहे। इसीलिए जब-जब भी कारसेवा या अन्य कोई आह्नान हुआ, केरल से भारी संख्या में नवयुवक अयोध्या गये। हिन्दू समाज को 73 वर्ष तक अपनी अनथक सेवाएं देने वाले स्वामीजी का 24 नवम्बर, 2006 को देहान्त हो गया।