ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर के नियम लागू करने को लेकर नया अपडेट सामने आया है। इसके तहत सरकार ने नई नीति को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से 2 साल का और समय मांगा है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे 2012 से लागू करने के लिए कहा था। केंद्र सरकार ने अपनी मजबूरी बताई है।
नई दिल्ली: OBC आरक्षण के लिए ‘क्रीमी लेयर’ के नियम को 2012 से लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने की चुनौती का सामना करते हुए, केंद्र सरकार ने कोर्ट से गुजारिश की कि इस फैसले को भविष्य से लागू किया जाए और इसे लागू करने के लिए दो साल का समय दिया जाए। कोर्ट ने मार्च में कहा था कि किसी उम्मीदवार को OBC आरक्षण से बाहर करने के लिए ‘क्रीमी लेयर’ तय करने का एकमात्र आधार माता-पिता की आय नहीं हो सकती; इसके लिए ‘आय/संपत्ति टेस्ट’ के साथ-साथ माता-पिता की नौकरी का दर्जा और श्रेणी को भी एक अतिरिक्त आधार के तौर पर देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने इस फैसले को 2012 से लागू करने का आदेश दिया था, जब यह मामला पहली बार दायर किया गया था।
सरकार ने बताई मजबूरी
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी की ओर से दाखिल एक लिखित नोट में सरकार ने कहा कि योग्यता के बदले हुए नियमों को पिछली तारीख से लागू करने पर, उस समय के नियमों और सर्टिफिकेट के आधार पर हुई नियुक्तियों और एडमिशन पर असर पड़ सकता है। इससे OBC-NCL स्टेटस, सीनियरिटी, सर्विस की शर्तों और करियर में आगे बढ़ने को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
नोट में कहा गया है कि इस फैसले को पिछली तारीख से लागू करने पर उम्मीदवारों की सर्विस और कैडर अलॉटमेंट में बदलाव हो सकते हैं। क्योंकि इससे CSE-2012 और उसके बाद नियुक्त लोगों की सर्विस पर असर पड़ेगा और सिविल सर्वेंट्स के बीच इसका व्यापक असर (कैस्केडिंग इफेक्ट) देखने को मिलेगा। इस असर का सामना न सिर्फ OBC उम्मीदवार करेंगे, बल्कि सिविल सर्विस की सभी कैटेगरी (जिनमें अनरिजर्व्ड कैटेगरी भी शामिल है) पर भी इसका असर पड़ेगा।
सरकार ने मांगा 2 साल का समय
सरकार ने कहा कि सभी स्टेकहोल्डर्स से बातचीत करने और OBC क्रीमी लेयर स्टेटस तय करने के लिए एक समान पॉलिसी या तरीका बनाने के बाद, पदों की बराबरी (इक्विवेलेंस) तय करने की जरूरी प्रक्रिया पूरी करने के लिए उसे दो साल का उचित समय दिया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि भारत सरकार सिर्फ इस माननीय अदालत द्वारा तय किए गए कानून को लागू करने में दो साल की सीमित देरी की मांग कर रही है, ताकि प्रशासनिक जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग अधिकारों में तालमेल बिठाया जा सके और बराबरी लाने की एक असरदार प्रक्रिया पूरी की जा सके।
