पहले बताये थे कि 1975 जनवरी से 27 जून तक हम इसी जेल में अकेले भी थे और तनहाई में रखे गए थे।
तन्हाई का मतलब समझिए पहले।
मतलब पूरी बैरक में हमको अकेले रखा गया – लेकिन निगरानी के लिए दो पीली वर्दी वाले पक्का भी थे।
(पक्का मतलब आजीवन जेल सजा पाया शातिर डकैत या हत्या सजायाफ्ता)
दिन तो कट जाता था कोई न कोई जेलर सिपाही डाक्टर आते रहते थे।
तब फतेहगढ जेल बैरक मे बिजली कनेक्शन नहीं था।
शाम 5 बजे 9×5 फुट की कोठरी मे अन्दर कर #भोजन रख कर बाहर से ताला बन्द । #शौचालय भी इसी 9×5 में।
लेकिन दरवाजे के बाहर एक #लालटेन जलाकर, लेकिन इतनी दूर कि अन्दर से हाथ बढाकर छू न सकें उससे भी दूर । यह सावधानी इसलिए कि कोई आत्महत्या के लिए आग या तेल न पा सके।
अब रात की बात
बाहर रखी लालटेन की हल्की रोशनी के सामने खडे हो जाते तो #दीवार_पर_परछाईं पड़ती तो अपने सिर पर अलगअलग तरह की पगडी बांधने से परछाई का रूप बदल जाता था। कभी लोकमान्य_तिलक कभी #सरदार_भगतसिंह आदि आदि से खूब बातेंकरता था । उनके डायलॉग भी खूब उनको सुनाता – लेकिन वह महापुरुष न तो कभी बोले न मुझे रोके।
कभी-कभार अन्तक्षरी भी करते थे लेकिन दोनो कविताए मैं ही पढता था।
महापुरुष लोग कभी एक लाइन भी नही बोले – शायद सब भूल चुके थे।
तेल चोरी या बचत के कारण 8 बजते बजते लालटेन तेल खत्म बत्ती गुल।
फिर अंधेरे में डायरी में उनको पत्र लिखता था जिन्होने पलंग गांव मे हटा कर जमीन पर ही सोने का हठ कर लिया था।
आप भी कभी अंधेरे मे पत्नी को पत्र लिखिए – बहुत आसानी से लिख लेगें –एकाध दिन मे ही।
फिर नींद तो आ ही जाती थी।
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रामाधीनसिंह
पूर्व अध्यक्ष इविवि यूनियन
