घर बैठे कर रहा छप्परफाड़ कमाई.बिहार* कहते हैं कि अगर सोच बदली दी जाए, तो मिट्टी भी सोना उगाने लगती है. यही कर दिखाया है समस्तीपुर जिले के किसान शिवचंद्र ने. उन्होंने पारंपरिक तरीके के धान-गेहूं की खेती छोड़कर तुलसी की खेती को अपनी पहचान बना लिया है. जहां अधिकतर किसान मौसम, लागत और बाजार की अनिश्चितता से परेशान हैं. वहीं, किसान शिवचंद्र ने अपनी दूरदृष्टि से खेती को लाभ का व्यवसाय बनाया है. आज वह साल में 3 बार तुलसी की हार्वेस्टिंग करते हैं और सिर्फ 1 बीघा जमीन से 200000 लाख रुपये तक की कमाई कर लेते हैं.
कम मेहनत, ज्यादा मुनाफा……. किसान शिवचंद्र बताते हैं कि तुलसी की खेती पारंपरिक खेती से बिल्कुल अलग है. इसमें न ज्यादा लागत लगती है और न ही अधिक मेहनत. वह कहते हैं कि तुलसी ऐसी फसल है, जिसमें बस एक बार पौधा तैयार कर दीजिए. फिर साल में 3 बार कटाई हो जाती है. पानी देने के अलावा कोई बड़ा खर्च नहीं. यह खेती उन किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है, जिनके पास सीमित जमीन और संसाधन हैं. तुलसी के पौधे को खास देखभाल की जरूरत नहीं होती है. यह जल्दी बढ़ने वाली फसल है. इस वजह से छोटे किसान भी कम जोखिम में अच्छी आमदनी कमा सकते हैं. *कंपनियां खेतों से कर लेती हैं खरीदारी*…… इस खेती में सबसे बड़ी चुनौती होती है. उत्पाद को बाजार तक पहुंचाना, लेकिन तुलसी की खेती में यह परेशानी भी नहीं है.
किसान शिवचंद्र बताते हैं कि तुलसी की मांग दवा, कॉस्मेटिक और सुगंध उद्योग में लगातार बढ़ रही है. वह कहते हैं, हमें माल बेचने के लिए बाजार नहीं खोजना पड़ता है. बल्कि कंपनी वाले खुद गांव आकर खरीद ले जाते हैं.इससे न केवल समय बचता है बल्कि किसानों को अपने उत्पाद का बेहतर दाम भी मिल जाता है. तुलसी की पत्तियों और तेल दोनों की बिक्री से उन्हें दुगुना फायदा होता है. शिवचंद्र के अनुसार, अगर मौसम साथ दे तो 1 बीघा में 2 लाख रुपये तक कमाना मुश्किल नहीं है. *नई सोच, नई राह*…… किसान शिवचंद्र की यह कहानी सिर्फ उनकी नहीं है.
बल्कि उस सोच की है, जो कृषि को परंपरा से नवाचार की ओर ले जा रही है. वे अब आसपास के किसानों को भी तुलसी की खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उनकी पहल से वैशाली और समस्तीपुर के कई किसान इस फसल की ओर आकर्षित हुए हैं.किसान शिवचंद्र कहते हैं कि किसान अगर पारंपरिक खेती से हटकर सोचें तो गांवों में ही अच्छी कमाई संभव है. तुलसी इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. सचमुच उनकी यह कम मेहनत, ज्यादा मुनाफा वाली खेती न सिर्फ आमदनी का जरिया बनी है. बल्कि यह दिखाती है कि नवाचार ही खेती का भविष्य है.
