भारत को आर्मेनिया और अजरबैजान के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों की परिभाषा नए सिरे से लिखनी पड़ेगी। इस क्षेत्र में जिस तरह से चीन दखल बढ़ाने की कोशिशों में है, भारत इनके साथ रिश्ते खराब नहीं कर सकता। हालांकि, इलाके की जियोपॉलिटिक्स को देखते हुए भारत के सामने नई तरह की चुनौती खड़ी हुई है।
नई दिल्ली: जियोपॉलिटिक्स में तेजी से बदलाव हो रहा है। भारत का खास रणनीतिक साझेदार आर्मेनिया अचानक पाकिस्तान के करीब जाता दिख रहा है। दोनों देशों में राजनयिक रिश्ते बनने शुरू हुए हैं। यह परिवर्तन आर्मेनिया और उसके कट्टर दुश्मन अजरबैजान के बीच शांति समझौते के बाद देखा जा रहा है। आर्मेनिया के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान भी अपना इरादा साफ किया है। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि वह आर्मेनिया के बदले हुए रुख पर किस तरह से प्रतिक्रिया दे। क्योंकि, तथ्य यह है कि आर्मेनिया ने अबतक एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभाई है।
आर्मेनिया, अजरबैजान में बैलेंस वाली रणनीति
ET की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र की जियोपॉलिटिक्स को देखते हुए समय की मांग है कि भारत को अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव करना पड़ सकता है। अगर आर्मेनिया और पाकिस्तान के बीच राजनयिक रिश्ते बन रहे हैं तो भारत को अजरबैजान के साथ अपने रिश्तों में भी नए सिरे से संभावनाओं की भी तलाश करनी चाहिए। 1990 के दशक से अजरबैजान, पाकिस्तान का सहयोगी है। लेकिन, इसका मतलब ये नहीं कि भारत को आर्मेनिया से रिश्ते खत्म करना चाहिए। यह हमारा रणनीतिक साझेदार और हमारे रक्षा उपकरणों और हथियारों का खरीदार भी है। बदले दौर में भारत, आर्मेनिया और ईरान के बीच त्रिपक्षीय सहयोग के तहत ‘इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ के विकल्प की भी तलाश कर सकता है।
इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर पर विचार
‘इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ का विचार इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि’जंगेजूर कॉरिडोर’ की हाल में काफी चर्चा रही है। यह एक ऐसा प्रस्तावित ट्रांसपोर्ट रूट है, जो अजरबैजान को उसके दूर-दराज वाले नखचिवन स्वायत्त गणराज्य से जोड़ेगा। यह रूट आर्मेनिया के स्यूनिक प्रांत को दरकिनार करने वाला है और भविष्य में यह तुर्की को भी यूरेशिया सेजोड़ सकता है। इस कॉरिडोर का अमेरिका फायदा उठाएगा, जो कि ईरान और रूस दोनों को खटक रहा है। यूं भी
आर्मेनिया दशकों से कश्मीर मुद्दे पर भारत का समर्थक रहा है। जबकि,अजरबैजान और तुर्की इस मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ रहे हैं।
