एक समय था जब HAL तेजस में कावेरी इंजिन लगाना चाहती थी लेकिन बाद में वह प्लान छोड़ दिया गया। एक समय था जब भारतीय वायुसेना तेजस विमानों को ही नहीं लेना चाहती थी, किन्तु आज प्राथमिकता बन गई है। …दोनों प्रोजेक्ट में क्या बदला और कैसे बदला इसे जानना आवश्यक है :-
• भारतीय वायुसेना 2010-12 आते-आते तेजस विमान को शामिल करने के लिए पक्षधर नहीं थी। यह वो समय था जब बढ़िया लड़ाकू विमान में तेज स्पीड और हाइ मैन्युएवर क्षमता मैटर करती थी। और तेजस इन दोनों क्षमताओं में बहुत अच्छा नहीं था।
लेकिन वर्ष 2014-15 आते-आते एक फाइटर जेट के लिए नई तकनीक ने जन्म लिया… जैसे अत्याधुनिक रडार (लॉन्ग रेंज AESA) EWS और सेल्फ प्रोटेक्शन जैमर (शत्रु विमानों की मिसाइलों से बचने हेतु) लॉन्ग रेंज BVR मिसाइलों, ग्राउंड अटैक हेतु स्टैंडऑफ वैपन बनने आरंभ हुए।
इन अत्याधुनिक प्रणालियों और मिसाइलों के बाद से लड़ाकू विमान एक प्लेटफॉर्म बनकर रह गए हैं, जिनकी भूमिका केवल इन अत्याधुनिक प्रणालियों और मिसाइलों को कैरी करने में सक्षम होना हो। लड़ाकू विमान की तेज स्पीड और हाइ मैन्युएवर क्षमता मैटर नहीं करता अब क्योंकि वह नौबत ही नहीं आ पाती BVR कॉम्बैट के कारण। क्योंकि लड़ाकू विमान को अब शत्रु के क्षेत्र में नहीं जाना पड़ता।
तेजस में इन सभी अत्याधुनिक प्रणालियों को लैस करना प्लान का हिस्सा बनते ही वायुसेना की पसंद बन गए तेजस विमान। तेजस मार्क 1 क्योंकि बहुत लाइट वेट कैटेगरी का विमान है इसकी इस कमी को तेजस मार्क 2 में दूर किया गया… जहां इसमें ज्यादा बदलाव ना करते हुए केवल इसकी लंबाई बढ़ाई है, डिज़ाइन वही बस थोड़ी सी लंबाई बढ़ने से ये ज्यादा वेट कैरी करने में सक्षम हो गया है। और दूसरा बदलाव इसके इंजिन में किया गया, जहां तेजस मार्क 1 में F404 इंजिन 85kn थ्रस्ट जनरेट करता है वहीं तेजस मार्क 2 में जाने वाला F414 इंजन 98kn थ्रस्ट जनरेट करता है। क्योंकि वेट कैरी कैपेसिटी बढ़ानी है तो पावर भी अधिक जनरेट करने वाला इंजिन चाहिए था।
• ऐसा नहीं है के तेजस मार्क 1 का अधिक लाइट वेट कैटेगरी का होना नुकसानदायक है। बल्कि इसको जो भूमिका दी गई है वहां इसका लाइट वेट होना इसका प्लस प्वाइंट है… इस विमान को इंटरसेप्टर और एयर पेट्रोलिंग की भूमिका दी गई है, जिसमें यह विमान सीमा के फ्रंट लाइन एयरबेस पर तैनात होंगे। शत्रु विमान द्वारा भारतीय वायुसेना में प्रवेश करने के प्रयासों पर तेजस अपने लाइट वेट के चलते त्वरित उड़ान भर सकने में सक्षम है।
और एयरबेस से तेजी से उड़ान भरते ही यह अपने अत्याधुनिक AESA रडार के कारण मल्टीपल टारगेट (शत्रु विमानों) को लॉक कर लेगा। तेजस के लिए DRDO ने एक ड्यूल रैक पायलॉन बनाया है जिससे कुल 2 हार्ड पॉइंट में शत्रु विमान को हिट करने वाली 4 BVR मिसाइलें कैरी करेगा तेजस। जबकि इससे पहले केवल 2 ही BVR मिसाइल ले जाने करने में सक्षम होता था तेजस मार्क 1। …इन 2 प्रकार के एज मिलने से एयर टू एयर कॉम्बैट में तेजस मार्क 1 विमान पाकिस्तान के JF-17 पर हर मामले में भारी पड़ता है। तेजस के साथ इंटीग्रेट Dual Rack Pylone की तस्वीर मैंने पोस्ट के साथ सलंग्न की हुई है।
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शुरुआत में तेजस के लिए कावेरी इंजिन प्लान किया गया था, जोकि 80kn थ्रस्ट जनरेट कर पाने में सक्षम हो। लेकिन 2014 आते-आते यह पाया गया कि भविष्य के विमान अत्याधुनिक प्रणालियों और शक्तिशाली रडार से लैस होंगे… जिसके लिए 80kn पावर बहुत कम है। और आकलन किया गया कि तेजस को अत्याधुनिक प्रणालियों से लैस करने हेतु कम से कम 85kn थ्रस्ट जनरेट करने वाला इंजिन चाहिए होगा। ऐसे में तेजस प्रोग्राम से कावेरी इंजिन को डीलिंक कर दिया गया और तेजस के लिए नए इंजिन की तलाश जनरल इलैक्ट्रिक के F404 पर जाकर समाप्त हुई।
जहां GTRE द्वारा बनाया गया कावेरी इंजिन 85kn थ्रस्ट जनरेट करना तो दूर,,, बल्कि शुरुआत में निर्धारित की गई 80kn थ्रस्ट भी जनरेट नहीं कर पा रहा था। वास्तव में कावेरी इंजिन का ड्राई सेक्शन 49.5kn थ्रस्ट जनरेट कर रहा था और आफ्टर बर्नर 23.5kn थ्रस्ट जनरेट कर रहा था यानि कुल 73kn थ्रस्ट जनरेट करने में सक्षम है कावेरी इंजिन। जबकि प्लान ये था के कावेरी इंजिन का ड्राई सैक्शन कम से कम 52kn थ्रस्ट जनरेट करे, पर उस आंकड़े से 2.5kn कम रह जाता है अभी कावेरी इंजिन।
वहीं 2015 के बाद भारत सरकार एक स्टेल्थ UCAV बॉम्बर (घातक प्रोजेक्ट) पर काम कर रही थी। यहां उसके लिए 48kn थ्रस्ट जनरेट करने वाले इंजिन की आवश्यकता थी। तभी DRDO ने पाया कि कावेरी का ड्राई थ्रस्ट सेक्शन 49.5kn पावर जनरेट करता है यानि UCAV बॉम्बर के लिए निर्धारित 48kn से 1.5kn थ्रस्ट ज्यादा ही है कावेरी इंजिन में। तब DRDO ने भारत सरकार से घातक UCAV प्रोग्राम में ड्राई थ्रस्ट कावेरी इंजिन को शामिल करने का प्रस्ताव रखा, जिसे सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया गया। UCAV घातक के लिए इस 49.5Kn ड्राई थ्रस्ट जनरेट करने वाले इंजिन को कावेरी डेरिवेटिव इंजिन (KDE) नाम दिया गया है।
• इस प्रकार कावेरी प्रोग्राम फेल तो नहीं हुआ, बस अपने निर्धारित उद्देश्य के बजाए अब दूसरे उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है।
