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“हाँ, मैं उस उत्तर प्रदेश से हूँ ……..जहाँ संन्यास ही राजसत्ता का रक्षक है और न्याय ही साक्षात कालभैरव का संकल्प!”

  “गाय का गोबर उठाने वाला, घंटी बजाने वाला यह बाबा क्या ख़ाक अर्थव्यवस्था चलाएगा?

   ज़रा अपनी सांसें थामिए और सोचिए—जो व्यक्ति अपनी देह पर जेब तक नहीं रखता, वह 25 करोड़ लोगों की तिजोरी का ऐसा पहरेदार कैसे बन गया कि 70 साल का लुटेरा तंत्र एक झटके में घुटनों पर आ गया?

अब आंखें बंद करो और उस 25 वर्षों के अग्निपथ को एक सांस में महसूस करो, जहाँ नियति ने एक संन्यासी को काल की कसौटी पर परखा था—
संसद की चौखट पर छलके उस एक लाचार सांसद के आंसुओं की वह आग (भाग 1)…
अपराधियों और दंगाइयों की छाती पर साक्षात दण्डधर बनकर गरजे उस बुलडोजर का न्याय (भाग 2)…
आजमगढ़ के खूनी मोड़ पर 32 गोलियों के बारूद और कालकोठरी के अंधकार को चीरकर निकला वह अजेय मृत्युंजय अवतार (भाग 3)…
और आज उसी राख के ढेर से 70 साल की दरिद्रता का भूगोल मिटाकर, 1 ट्रिलियन डॉलर की दहाड़ मारता यह अभेद्य औद्योगिक महासाम्राज्य (भाग 4)!
 
     यह किसी मुख्यमंत्री का पांच साल का रिपोर्ट कार्ड नहीं है; यह भारत के इतिहास में एक सिद्ध महायोगी के रक्त, तप और संकल्प से रचा गया सनातन के आर्थिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का दृश्य है!

      2017 से कसे जा रहे इस व्यंग्य और सवाल के बीच यह विष उगलने वाली नेहा वोहरा और मखमली सोफों पर बैठे लुटियंस के मठाधीशों की आँखें क्या आज एशिया के सबसे बड़े इंटरनेशनल एयरपोर्ट, बुंदेलखंड से गरजती ब्रह्मोस मिसाइलों और 40 लाख करोड़ के निवेश को देखकर शर्म से झुक गईं, या बौद्धिक दिवालियापन की कोई सीमा नहीं होती?

        जिस सूबे को सत्तर साल तक ‘बीमारू कोढ़’ कहकर मदिरा के प्यालों में डुबोया गया, जहाँ उद्योगपति अपनी नई फैक्ट्री की नींव रखने से पहले अपने कफ़न का नाप लेते थे—आज उसी माटी पर एक संन्यासी ने इन परजीवियों की पूरी सड़ी-गली थ्योरी की चिता जला दी है!
वे अज्ञानी भूल गए थे कि जिस सनातन धारा से संन्यास की अखंड धूनी जलती है, उसी सनातन विधान में महर्षि मनु ने संन्यासी-राजा के लिए अर्थ-नीति का सर्वोच्च सूत्र निर्धारित किया था। वैराग्य का अर्थ दरिद्रता का रोना रोना नहीं; प्रजा के दारिद्र्य और अभाव के दानव का संहार करने के लिए साक्षात सुदर्शन चक्र बन जाना होता है!
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः।
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्॥
(मनुस्मृति )
      अर्थात: जो संसाधन और वैभव अभी तक अप्राप्त है, उसे अपने प्रचंड पौरुष से प्राप्त करना; जो प्राप्त हो चुका है, उसकी पूरी शक्ति से रक्षा करना; जो सुरक्षित है, उसका निरंतर संवर्धन (मल्टीप्लाई) करना; और उस संवर्धित संपदा को जनकल्याण व सुपात्र प्रजा की उन्नति में समर्पित कर देना—यही राजधर्म का शाश्वत आर्थिक सिद्धांत है!
       उस खौफनाक मंजर को याद करो, जब दोपहर के ठीक दो बजे प्रयागराज, कानपुर या मेरठ के किसी व्यापारी की कनपटी पर अतीक और मुख्तार के गुर्गों की ठंडी नाल सटाई जाती थी—”कल सुबह तक पचास लाख की रंगदारी पहुंचा देना, वरना शाम को अपनी इकलौती औलाद की लाश नाले से उठाना!”
           वह आतंक केवल अपराधियों का नहीं था; सचिवालय से ठेके बांटे जाते थे और सत्ता-संरक्षित सिंडिकेट के इशारे पर थानों से वसूली के फरमान जारी होते थे। कांपते हाथों से उद्योगपति अपने कारखानों पर ताले जड़ते थे और रात के अंधेरे में पूंजी समेटकर राज्य की सीमाएं लांघ जाते थे। बंद पड़ी मिलों के जंग लगे सायरन चीखते थे और लाखों हुनरमंद नौजवान दूसरे राज्यों के रेलवे स्टेशनों पर ‘यूपी वाला’ होने की जिल्लत और लाठियां खाने के लिए विवश कर दिए गए थे।
          
       इसका जवाब लखनऊ के सचिवालय में रात के ठीक ढाई बजे मिलता है। जब पूरा प्रदेश गहरी नींद में सोता है, तब पंचम तल के उस कक्ष में लकड़ी की एक सादी कुर्सी पर बैठा वह संन्यासी फाइलों के उस सड़े-गले मकड़जाल की नसें काट रहा होता है, जिसने दशकों से उत्तर प्रदेश की सांसें घोंट रखी थीं।
जिस व्यक्ति का अपना कोई बैंक खाता नहीं, जिसका कोई बेटा-दामाद नहीं, जिसकी देह पर केवल दो गज मोटा सूती भगवा और पैरों में खड़ाऊं है—जब वह संन्यासी लाल बत्ती वाली गाड़ियों में घूमने वाले मठाधीश अफसरों की आंखों में आंखें डालकर फैसले लेता है, तो भ्रष्टाचार की पूरी व्यवस्था थर-थर कांपने लगती है।
     
       उसने किसी से व्यक्तिगत बदला नहीं लिया; उसने अर्थशास्त्र के उस सनातन नियम को धरातल पर उतारा कि—पूंजी वहीं आती है, जहाँ सुरक्षा की गारंटी होती है:
   जब संन्यासी के दण्ड-विधान ने 68 से अधिक दुर्दांत माफिया गिरोहों की 4000 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध हवेलियों को बुलडोजर तले रौंदकर मिट्टी में मिलाया और उस जमीन पर गरीबों के पक्के आशियाने खड़े किए, तो यह केवल ईंटों का ध्वस्तीकरण नहीं था! यह देश-दुनिया के उद्योगपतियों के कानों में उस संन्यासी की दहाड़ थी: “उत्तर प्रदेश में अब माफिया का सिक्का नहीं, केवल संविधान का राजदंड चलेगा; आओ और निर्भय होकर कारखाने लगाओ!”
         जिस संन्यासी को ‘पाषाण युग का बाबा’ बताकर अट्टहास किया गया था, ज़रा वोहरा जमात अपनी बिकाऊ आँखों से देखे कि आज उसी बाबा के सामने दुनिया के सबसे आधुनिक टेक-जाइंट्स, फॉर्च्यून-500 कंपनियां और मल्टीनेशनल उद्योगपति सिर झुकाकर 40 लाख करोड़ रुपये का निवेश धरातल पर उतार रहे हैं!
 
      जिस बुंदेलखंड की जलती, पथरीली धरती पर कल तक ददुआ और ठोकिया जैसे खूंखार डकैतों की बंदूकों की गूंज से मांओं की कोख उजड़ जाती थी और जहां पानी की एक घूंट के लिए मीलों भटकना पड़ता था—आज अपनी छाती चौड़ी करके देखो! उसी बुंदेलखंड के झांसी और चित्रकूट डिफेंस कॉरिडोर में भारत की सेना के लिए तोपें, टैंक और दुश्मनों के बंकर उड़ाने वाली ‘ब्रह्मोस मिसाइल’ के घातक वारहेड ढल रहे हैं! जिस युवा के हाथ में पूर्ववर्ती हुकूमतों ने तमंचे या बेरोजगारी का ठप्पा दिया था, आज उसी युवा के हाथ में ब्रह्मोस के कलपुर्जे और दुनिया भर के कोड लिखने वाला लैपटॉप है!
 
       2017 से पहले जो राजकोष बिचौलियों, खनन माफिया और फर्जी बिलिंग के गटर में बह जाता था और राज्य का स्वयं का कर-राजस्व महज 86 हजार करोड़ पर दम तोड़ रहा था, उस संन्यासी ने बिना एक भी नया जनविरोधी टैक्स लगाए, केवल चोरों की गर्दन पर अंगूठा रखकर उसी खजाने को ढाई लाख करोड़ के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंचा दिया। जो सूबा वेतन बांटने के लिए केंद्र के आगे कटोरा लेकर खड़ा रहता था, आज उसका वित्तीय अनुशासन पूरे देश के लिए नजीर बन चुका है।
 
     भदोही के कालीन बुनकर की उंगलियों से रिसता खून, मुरादाबाद के पीतल कारीगर के हथौड़े की मार, कन्नौज के इत्र की महक और अलीगढ़ के ताले—जिन्हें पूर्ववर्ती हुकूमतों ने कौड़ियों के मोल नीलाम कर दिया था, संन्यासी ने ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ की ऐसी संजीवनी फूंकी कि वही कारीगर आज न्यूयॉर्क, लंदन और पेरिस के बाजारों में भारत की दस्तकारी का परचम लहरा रहे हैं। दो लाख करोड़ रुपये का निर्यात किसी कागजी थ्योरी से नहीं, उन कारीगरों के पसीने को मिले राजधर्म के सम्मान से पैदा हुआ है!
 
  जो विदेशी ताकतें भारत को सदैव ‘सपेरों और गरीबों का देश’ बताकर अपनी हेकड़ी दिखाती थीं, जेवर की छाती पर एशिया का सबसे बड़ा ‘नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ कंक्रीट की चट्टान बनकर खड़ा हो रहा है। 21 से अधिक हवाई अड्डों, 5 इंटरनेशनल रनवे और देश के 37% से अधिक एक्सप्रेसवे नेटवर्क के साथ यह राज्य अब उड़ानों का अड्डा नहीं, वैश्विक महाशक्तियों की आंखों में आंखें डालकर बात करने वाला औद्योगिक दैत्य बन चुका है।
 
यथा चोद्धरते शल्यं धनी धान्यं च रक्षति।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः॥
 (मनुस्मृति )
अर्थात: जैसे एक परिश्रमी किसान अपनी लहलहाती फसल की रक्षा के लिए खेत से विषैले कांटों, खरपतवार और परजीवियों (शल्य) को उखाड़ फेंकता है; ठीक उसी प्रकार संन्यासी राजा का परम धर्म है कि वह राष्ट्र के भीतर छिपे आर्थिक लुटेरों, माफियाओं और आततायियों का समूल संहार कर प्रजा की समृद्धि और राष्ट्रीय संपदा की रक्षा करे!
 
     अब ज़रा स्टूडियो के वातानुकूलित केबिनों में बैठकर, संन्यासी के वस्त्रों पर अशोभनीय अभद्र बातें बोलने वाली नेहा वोहरा जैसी परजीवी जमात अपने गिरेबान में झांक कर बताए—
         जब तुम्हारे वैचारिक आकाओं के दौर में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग और पुलिस भर्तियों की बोलियां चौराहों पर लगती थीं, जब एक-एक नौकरी के लिए किसानों को अपनी जमीनें बेचनी पड़ती थीं और नौजवान आत्महत्या की कगार पर खड़े थे, दंगे और गुंडई चरम पर थी तब तुम्हारी यह ‘ जुबान’ किस बिल में दुबकी थी?
तुमने तो 25 करोड़ जनता को केवल जाति की संकीर्ण नालियों में बहाया ताकि तुम्हारी तिजोरियां भर सकें! उस संन्यासी ने तुम्हारे इस सड़े-गले परजीवी नैरेटिव को हमेशा के लिए जलाकर भस्म कर दिया। उसने प्रमाणित कर दिया कि सच्चा अध्यात्म केवल मंदिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं होता; वह एशिया के सबसे बड़े डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर प्लांट्स और 40 लाख करोड़ के निवेश महायज्ञ को भी जमीन का सीना चीरकर बाहर निकालने का सामर्थ्य रखता है!
   आज जब उत्तर प्रदेश का कोई भी नौजवान दुनिया के किसी भी कोने में खड़ा होकर अपना माथा ऊंचा करता है, तो वह किसी याचक की तरह नहीं देखता; वह अपनी छाती ठोककर स्वाभिमान से गरजता है
 
—”हाँ, मैं उस उत्तर प्रदेश से हूँ ……..
 
……जहाँ संन्यास ही राजसत्ता का रक्षक है और न्याय ही साक्षात कालभैरव का संकल्प!”
 
“इतिहास गवाह है—जब सिंहासन पर कोई भोगी बैठता है तो राष्ट्र नीलाम हो जाता है; लेकिन जब सिंहासन पर कोई निष्काम योगी बैठता है, तो वह काल के कपाल पर भी अखंड भारत के वैभव का सूर्य टांग देता है!”
 
“क्या 2017 से पहले का यूपी और आज का यूपी देखने वाले इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं? अपनी राय कमेंट में अवश्य लिखें।”