सुप्रीम कोर्ट ने चंबल एरिया में अवैध रेत खनन पर कड़ी टिप्पणी की है। शुक्रवार को अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में नदी तल में बेतहाशा खनन ने वहां तबाही मचा दी है। पर्यावरणीय संकट से घड़ियाल संरक्षण प्रोजेक्ट पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है। कोर्ट ने राजस्थान, MP और UP सरकारों को यहां हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे लगाने के निर्देश दिए।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल सॅक्चुअरी में अवैध रेत खनन को लेकर मध्य प्रदेश सरकार के रुख पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य अपनी लाचारी या कमियों का हवाला देकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। कोर्ट ने इसे चौंकाने वाला और चिंताजनक बताया कि राज्य ने नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में कहा कि उसके वन अधिकारी रेत माफिया के मुकाबले के लिए पर्याप्त हथियारों से लैस नहीं है, जबकि माफिया के पास आधुनिक हथियार और वाहन हैं।
कोर्ट ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों से अवैध खनन वाले मार्गों पर हाई-रिजॉल्यूशन वाई-फाई सक्षम सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 11 मई को होगी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि इस तरह की दलील न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि राज्य अवैध गतिविधियों को रोकने के प्रति गंभीर नहीं है।
ठोस कदम नहीं उठाए तो पैरामिलिट्री फोर्स की होगी तैनाती’
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी कमियां सीधे तौर पर गैरकानूनी खनन, हिंसा, मानव जीवन के नुकसान और दुर्लभ वन्यजीवों के आवास के विनाश को बढ़ावा देती हैं। कोर्ट ने ने यह भी कहा कि प्रवर्तन एजेंसियों को पर्याप्त संसाधन और सुरक्षा न देना शासन व्यवस्था और कानून के राज को कमजोर करता है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर राज्यों ने ठोस कदम नहीं उठाए तो वह पैरामिलिट्री बल की तैनाती, खनन पर पूर्ण प्रतिबंध और भारी जुर्माने जैसे कड़े आदेश दे सकता है।
क्या रेत खनन पर और बढ़ेगी सख्ती ?
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मतलब है कि चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन को अब सख्ती से रोका जाएगा। इससे घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और अन्य दुर्लभ जीवों का आवास सुरक्षित होगा।
- नदी का जल प्रवाह और जैव विविधता बचाने में मदद मिलेगी।
- प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी।
