कंगाली और भारी कर्ज से जूझ रहे पाकिस्तान ने ईरान-सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव में अपनी परमाणु ताकत का दांव लगा दिया है. 1982 के रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब की संप्रभुता के लिए सेना और मिसाइल रेजिमेंट को अलर्ट पर रखा है. अपनी आर्थिक रीढ़ (सऊदी फंड) बचाने की यह ‘मजबूरी’ अब मुस्लिम जगत के दो बड़े देशों को सीधे युद्ध की ओर धकेल रही है.
नई दिल्ली. एक तरफ कंगाली की कगार पर खड़ा पाकिस्तान, जहां आवाम दाने-दाने को मोहताज है और दूसरी तरफ बारूद के ढेर पर बैठा मिडिल ईस्ट. खुद अपनी ही बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान ने अब ईरान और सऊदी अरब के बीच सुलगती जंग की आग में कूदने का ऐसा आत्मघाती ऐलान कर दिया है जिसने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया है. अपनी हालत पतली होने के बावजूद इस्लामाबाद ने रियाद की खातिर परमाणु बटन दबाने तक की कसम खा ली है. यह कंगाली में आटा गीला करने जैसा फैसला है या विनाश की ओर बढ़ा एक और कदम? पाकिस्तान के इस दुस्साहस ने मुस्लिम जगत के दो सबसे बड़े दिग्गजों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है जिससे तीसरे विश्व युद्ध की आहट साफ सुनाई देने लगी है.
ईरान-सऊदी युद्ध: पाकिस्तान की एंट्री से बदला युद्ध का समीकरण
· सऊदी की सुरक्षा के लिए पाकिस्तानी सेना का ऐलान: पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष में विस्तार होता है तो पाकिस्तान सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए अपनी सेना तैनात करेगा. यह बयान उस समय आया है जब खाड़ी देशों पर हमले का खतरा बढ़ रहा है.
ईरान की धमकी का सीधा जवाब: यह सैन्य प्रतिबद्धता ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की उस चेतावनी के बाद आई है जिसमें उन्होंने खाड़ी देशों के तेल और गैस बुनियादी ढांचे को सालों तक नष्ट करने की बात कही थी. पाकिस्तान का यह कदम ईरान के लिए एक सीधा कूटनीतिक और सैन्य संदेश है कि सऊदी अरब के संसाधनों पर हमला उसे भारी पड़ सकता है.
1982 का रक्षा प्रोटोकॉल हुआ एक्टिव: पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच दशकों पुराने 1982 के द्विपक्षीय रक्षा प्रोटोकॉल को तत्काल प्रभाव से ‘एक्टिव’ मोड पर डाल दिया गया है. इस संधि के तहत पाकिस्तान कानूनी और नैतिक रूप से सऊदी की सुरक्षा के लिए बाध्य है. यह प्रोटोकॉल दोनों देशों के बीच के अटूट सैन्य संबंधों को एक वैधानिक आधार प्रदान करता है.
· युद्ध में परमाणु शक्ति की एंट्री: पाकिस्तान की इस घोषणा का सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह है कि अब इस संघर्ष में एक घोषित परमाणु शक्ति संपन्न देश की सीधी एंट्री हो गई है. यह ईरान की सैन्य बढ़त और उसके ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस जैसे अभियानों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है, जिससे क्षेत्र में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा.
· वायु सेना और मिसाइल रेजिमेंट हाई अलर्ट पर: संभावित खतरों को देखते हुए पाकिस्तान की वायु सेना (PAF) और मिसाइल रेजिमेंट को हाई अलर्ट पर रखा गया है. इसका उद्देश्य सऊदी अरब के प्रमुख तेल केंद्रों जैसे ‘रास तनुरा’ पर होने वाले किसी भी हवाई या मिसाइल हमले का तत्काल और करारा जवाब देना है. यह सक्रिय सैन्य तैयारी पाकिस्तान की गंभीरता को दर्शाती है.
· आर्थिक रीढ़ बचाने की मजबूरी: पाकिस्तान की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था काफी हद तक सऊदी अरब के वित्तीय सहयोग और तेल आपूर्ति पर टिकी है. ऐसे में सऊदी के तेल बुनियादी ढांचे पर किसी भी प्रकार का हमला पाकिस्तान के लिए अपनी खुद की आर्थिक रीढ़ पर हमले के समान है. अपनी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पाकिस्तान के पास सऊदी का साथ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
· वैश्विक युद्ध की आहट और मुस्लिम जगत का विभाजन: पाकिस्तान के इस कदम से यह साफ हो गया है कि मौजूदा संकट अब केवल ‘इजरायल-ईरान’ तक सीमित नहीं है. यह अब एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल चुका है, जहां मुस्लिम जगत के दो सबसे शक्तिशाली देश आमने-सामने खड़े हो सकते हैं. यह स्थिति तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं को और अधिक बल दे रही है.
पाकिस्तान की आर्थिक मजबूरी
पाकिस्तान का यह फैसला उसकी आर्थिक मजबूरी और रणनीतिक जुए का मिश्रण है. एक ओर देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह सऊदी अरब के वित्तीय पैकेज और तेल पर टिकी है तो दूसरी ओर ईरान जैसा पड़ोसी है जिससे दुश्मनी लेना जलते बारूद में हाथ डालने जैसा है. पाकिस्तान की वायु सेना और मिसाइल रेजिमेंट का ‘हाई अलर्ट’ पर होना यह दर्शाता है कि वह अब केवल मध्यस्थ नहीं बल्कि एक सीधा पक्षकार बन चुका है. एक परमाणु शक्ति की एंट्री ने इस युद्ध को केवल क्षेत्रीय संघर्ष से ऊपर उठाकर एक वैश्विक संकट बना दिया है. यदि ईरान के तेल क्षेत्रों पर जवाबी हमला होता है तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट और आर्थिक महामंदी का खतरा पैदा हो जाएगा जिससे खुद पाकिस्तान की हालत और अधिक ‘पतली’ हो सकती है.
पाकिस्तान का यह फैसला उसकी आर्थिक मजबूरी और रणनीतिक जुए का मिश्रण है. एक ओर देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह सऊदी अरब के वित्तीय पैकेज और तेल पर टिकी है तो दूसरी ओर ईरान जैसा पड़ोसी है जिससे दुश्मनी लेना जलते बारूद में हाथ डालने जैसा है. पाकिस्तान की वायु सेना और मिसाइल रेजिमेंट का ‘हाई अलर्ट’ पर होना यह दर्शाता है कि वह अब केवल मध्यस्थ नहीं बल्कि एक सीधा पक्षकार बन चुका है. एक परमाणु शक्ति की एंट्री ने इस युद्ध को केवल क्षेत्रीय संघर्ष से ऊपर उठाकर एक वैश्विक संकट बना दिया है. यदि ईरान के तेल क्षेत्रों पर जवाबी हमला होता है तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट और आर्थिक महामंदी का खतरा पैदा हो जाएगा जिससे खुद पाकिस्तान की हालत और अधिक ‘पतली’ हो सकती है.
