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सुन्दर काव्य रचना का आन्नद ले…ठंड का मौसम देखो! जा ठंडी…… देखो! जा ठंडी, बहुतै घमंडी

काव्य रचना:

ठंड का मौसम देखो!

जा ठंडी…… देखो!

जा ठंडी, बहुतै घमंडी।

पगडंडी में छायी, कोहरे की मंडी।।

जाडे़ की ओस तो, ऊपर उड़त भाप।

गरम पानी खौल, जैसे जल है उड़ात।।

पानी में डार हाथ, बहुतै सन्नात।

कपकपी मानुष खाँ बहुतै है सतात।।

देखो! जा ठंडी, बहुतै घमंडी।

पगडंडी में छायी, कोहरे की मंडी।।

बच्चा स्कूलन में, कैसे पढ़न जात।

इनखाँ देखो छुट्टी, बहुतै इफरात।।

सूटर में जा ओस, भीतर बैठ जात।

स्कूटर में जो जाड़ो, घूमन है जात।।

देखो! जा ठंडी, बहुतै घमंडी।

पगडंडी में छायी, कोहरे की मंडी।।

घर के जे पौधे, छुपत-छुपत जात।

तुलसी खाँ ठंडी, नहीं है पुसात।।

भौरे औ तितली, नैयाँ दिखात।

कोयल बिन बगिया, ज्यादै लजात।।

देखो! जा ठंडी, बहुतै घमंडी।

पगडंडी में छायी, कोहरे की मंडी।।

कंडा और लकरी, सीत में नहात।

चूल्हो ओ गुंइंया, कैसे जर पाए।।

कोऊ बारो चूल्हो, गक्कड़ बनाएं।

भर्ता, गुड़, चटनी, सबै खाँ खबाएं।।

देखो! जा ठंडी, बहुतै घमंडी।

पगडंडी में छायी, कोहरे की मंडी।।

प्रस्तुति-डॉ. प्रज्ञा मिश्रा, प्राध्यापक, संस्कृत विभाग, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट।