ब्रह्मोस भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई मिसाइल है। इसे दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है
भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच एक बड़े रक्षा सौदे को लेकर बातचीत चल रही है। खबर है कि यूएई भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल और आकाशतीर एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बातचीत अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन तेजी से आगे बढ़ रही है। अगर यह सौदा होता है, तो यह भारत के रक्षा निर्यात के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
ब्रह्मोस मिसाइल क्यों है खास?
ब्रह्मोस भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई मिसाइल है। इसे दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे जमीन, समुद्र और हवा तीनों जगहों से लॉन्च किया जा सकता है। भारत ने 2022 में पहली बार फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल बेची थी। इसके बाद कई देशों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई है।
आकाशतीर सिस्टम भी यूएई की पसंद में शामिल
ब्रह्मोस के अलावा यूएई भारत के आकाशतीर एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर भी रुचि दिखा रहा है। आकाशतीर एक ऑटोमेटेड सिस्टम है जो अलग-अलग रडार और सेंसर से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर हवाई खतरों की पहचान करता है और सेना को तुरंत जवाबी कार्रवाई में मदद करता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिस्टम यूएई के मौजूदा एयर डिफेंस नेटवर्क को और मजबूत बना सकता है।
आखिर यूएई को इन हथियारों की जरूरत क्यों?
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में तनाव काफी बढ़ा है। ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष के दौरान क्षेत्र के कई देशों को सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यूएई के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा भी बेहद अहम है, क्योंकि उसके ऊर्जा निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में वह अपनी रक्षा क्षमता को और मजबूत करना चाहता है।
अमेरिका के अलावा दूसरे विकल्प भी तलाश रहा है यूएई
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम एशिया में हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर अमेरिका है। लेकिन अब यूएई अपनी निर्भरता कम करने और हथियारों के लिए नए स्रोत तलाशने की कोशिश कर रहा है।
आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा (ACLED) की साउथ एशिया सीनियर एनालिस्ट पर्ल पांड्या कहती हैं कि अलग-अलग देशों से रक्षा उपकरण खरीदने से यूएई को ज्यादा रणनीतिक स्वतंत्रता मिलेगी। उनके मुताबिक भारत के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने का फायदा यह भी है कि इससे अमेरिका के साथ उसके रिश्तों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
रूस की मंजूरी भी जरूरी होगी
चूंकि ब्रह्मोस भारत और रूस की संयुक्त परियोजना है, इसलिए इसकी किसी भी नई बिक्री के लिए रूस की मंजूरी जरूरी होगी। हालांकि सूत्रों का कहना है कि रूस और यूएई के बीच अच्छे संबंध हैं, इसलिए मंजूरी मिलने में बड़ी परेशानी की संभावना नहीं है।
विशेषज्ञों की क्या राय है?
SIPRI के आर्म्स ट्रांसफर प्रोग्राम के वरिष्ठ शोधकर्ता साइमन वेज़मैन का कहना है कि ब्रह्मोस मिसाइल और आकाशतीर सिस्टम दोनों ही यूएई की सुरक्षा जरूरतों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। उनके मुताबिक, खाड़ी देशों को हथियार बेचने की दौड़ में प्रतिस्पर्धा जरूर बढ़ रही है, लेकिन भारत के लिए यूएई और दूसरे खाड़ी देशों के साथ रक्षा सौदों की अच्छी संभावनाएं हैं।
भारत-यूएई रिश्तों में नई मजबूती
पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के बीच व्यापार, ऊर्जा और निवेश के क्षेत्र में सहयोग तेजी से बढ़ा है। दोनों देशों ने सैन्य उपकरणों के संयुक्त विकास को लेकर भी समझौते किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस और आकाशतीर को लेकर चल रही बातचीत सिर्फ हथियारों की बिक्री नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक भरोसे का संकेत भी है। पर्ल पांड्या के मुताबिक, भारत और यूएई के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग क्षेत्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है और दोनों देशों को अपनी साझेदारी की मजबूती दिखाने का अवसर देता है।
ब्रह्मोस को मिल रही है दुनिया भर से मांग
सूत्रों के अनुसार, पिछले साल भारत-पाकिस्तान संघर्ष में ब्रह्मोस के इस्तेमाल के बाद कई देशों की दिलचस्पी इस मिसाइल में बढ़ी है। भारत फिलीपींस के अलावा वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ भी ब्रह्मोस को लेकर समझौते कर चुका है। वहीं थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चिली जैसे देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है।
रक्षा निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
भारत का रक्षा निर्यात लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 तक के वित्त वर्ष में भारत का रक्षा निर्यात 4 अरब डॉलर से अधिक रहा। 2013-14 में यह आंकड़ा सिर्फ 72.6 लाख डॉलर था। इससे साफ है कि भारत अब दुनिया के रक्षा बाजार में एक महत्वपूर्ण निर्यातक के रूप में उभर रहा है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह सौदा?
अगर यूएई के साथ यह सौदा होता है, तो इससे भारत की रक्षा तकनीक को वैश्विक स्तर पर और पहचान मिलेगी। साथ ही पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत होगी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा भारत की “मेक इन इंडिया” और रक्षा निर्यात बढ़ाने की रणनीति को भी बड़ा समर्थन देगा। (रॉयटर्स के इनपुट के साथ)
