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सुप्रीमकोर्ट के जज द्वारा आराध्य श्री हरी विष्णु को लेकर की गई की टिप्पणी पर त्वरित प्रतिक्रिया!!

    वर्तमान समय में एक विषय बहुत तेजी से प्रचारित हो रहा है कि किसी मूर्ति को या किसी मंदिर को| अधर्मी तत्वों द्वारा तोड़ दिया गया तो उसके पुनः निर्माण और पुनः प्रतिष्ठा करने के विषय में लोग| कहते हैं कि तुम्हारा भगवान ही खुद क्यों नहीं कर लेता ?
       तो चलिए शास्त्रीय दृष्टि से थोड़ा इस पर नजर डालते हैं। पहले भगवान कैसे हैं इस पर विचार करते हैं| उपनिषद और पुराणों में -भगवान के गुण बताए गए हैं भगवान कैसे हैं| भगवान निर्विकार है उनमें विकार नहीं है| भगवान सर्वत्र सर्वव्यापक है| भगवान अखंड है। मानस में भगवान कैसे हैं यह बात तुलसीदास जी ने एक ही चौपाई में वर्णित कर दी गई है जिस मे सभी शास्त्रों का निचोड़ आ जाता है जो निम्नलिखित है|   ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुण नाम न रूप।
अरुण सिंह (संपादक)

भगवान इस तरह है इसलिए भगवान को मंदिर होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है| जब मंदिर नहीं था तब भी भगवान थे| जब मूर्ति में आवाहन किया गया तब भी भगवान थे| जब मूर्ति तोड़ दी गई तब भी भगवान है| भगवान में कुछ भी अंतर नहीं आया है क्योंकि वह अखंड और सर्वव्यापक है वह सब जगह है| अब भगवान साकार क्यों होते हैं इस विषय पर थोड़ा विचार करना चाहिए| तो इसी चौपाई के आगे वाली चौपाई में तुलसीदास जी ने लिखा है। *भगत हेतु नाना बिधि करत चरित अनुप।* इसका अर्थ भगवान भक्त के लिए साकार होते हैं।

        श्रीमद् भागवत में कुंती देवी जब भगवान की स्तुति करती है तो कहती है| कि लोग कहते हैं आपने इस कारण अवतार लिया उस कारण अवतार लिया परंतु सच कहूं तो आप अपने सिर्फ भक्तों के लिए अवतार लेते है।अब जब भक्त के लिए यह सब किया जा रहा है तो भगवान भक्त के साथ कैसा बर्ताव करते हैं इस विषय पर भी विचार करना चाहिए।
     भगवान गीता में कहते हैं कि जो मुझको जिस तरह भजता है मैं भी उसको उसी तरह भजता हूं| आगे भगवान कहते हैं की भक्त मुझे जिस रूप में भजता है मैं उसी रूप में उसकी श्रद्धा को बलवती करता हूं|इसलिए जब भक्त भगवान की मान्यता मूर्ति में पूर्ण रूपेण करने लगता है तो मूर्ति भी भक्त के साथ वैसा ही बर्ताव करती है क्योंकि भगवान तो सब जगह है| और उसे मूर्ति के माध्यम से ईश्वर का साक्षात्कार होता है|।
       भगवान ने गीता में कहा है कि जो जैसा मुझे भजता है मैं भी उसे वैसा भजता हूं|इसलिए भक्त भगवान के आश्रित हो जाता है उसी प्रकार भगवान भी भक्त के आश्रित हो जाते हैं इस नियम के कारण। इसलिए भागवत महापुराण में भगवान कहते हैं कि मैं भक्तों के पराधीन हूं|।इसीलिए मंदिर बनाने की मूर्ति को रिनोवेट करने की जिम्मेदारी हमारी ही है| क्योंकि साकार रूप में ईश्वर प्रेम के कारण भक्ति के पराधीन हो जाता है| इसलिए यह कहना कि भगवान ही खुद की मूर्ति खुद क्यों नहीं सही कर लेते यह बात गलत है क्योंकि भगवान को मूर्ति के ठीक ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है| परंतु भक्तों को पड़ता है| इसलिए यह भक्तों का ही कर्तव्य है|
       जैसे हवा सब जगह है| परंतु टायर में हवा भरने के लिए हमें हवा को एकत्रित करना पड़ता है| फिर हम उसे टायर में भरते हैं और हमारा कार्य सिद्ध होता है|इन सब कार्यों में हवा को कोई भी कहीं भी दिक्कत नहीं है हवा सब जगह है जब तुमने उसे भरने के लिए एकत्रित किया तो वह वहां भी आ गई उसको वहां भी दिक्कत नहीं है और टायर में भी चली गई उसको वहां भी दिक्कत नहीं है टायर फूटने के बाद हवा वहां से निकल गई तब भी उसे दिक्कत नहीं थी परंतु टायर से जाते ही हम लोगों को दिक्कत हो गई|
       इसी तरह मूर्ति में आवाहन करने पर भगवान आ जाते हैं फल देते हैं मदद करते हैं भक्तों को आश्रय देते हैं| भगवान को कोई भी फर्क नहीं पड़ता भगवान एक रस है वह मूर्ति बनने से पहले भी पूर्ण थे मूर्ति में आ जाने के बाद भी पूर्ण रहे और मूर्ति टूट जाने के बाद भी पूर्ण ही रहेंगे उनको कोई अंतर नहीं है|। परंतु हम लोगों को सुविधा का अंतर हो गया हमको दिक्कत हुई इसलिए यह सब जिम्मेदारी हमारी है।