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आज से हो रही भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा आरम्भ ,भगवान जगन्नाथ मंत्र, घर पर ही करें जगन्नाथजी की पूजा, जानें पूरी विधि और मंत्र

    जगन्नाथ रथ यात्रा का आरंभ 16 जुलाई यानी आज से हो रहा है। मान्यता है कि जो व्यक्ति जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होता है और भगवान जगन्नाथ के रथ को खिंचता है उसे 100 यज्ञ करवाने के बराबर फल प्राप्त होता है। अगर पर रथयात्रा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं तो घर पर ही भगवान जगन्नाथ के मंत्रों का जप करें। जानें मंत्र और पूजा विधि।

आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का आरंभ हो जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ के साथ उनकी बहन सुभद्रा और उनके बड़े भाई बलराम भी रथ पर सवार होकर पुरी धाम से निकलकर अपनी मौसा के घर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। यहां कुछ दिन ठहरने के बाद वापस अपने स्थान लौटते हैं। आज भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आरंभ हो गई है। ऐसी मान्यता है कि जो लोग भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में शामिल होते हैं और रथ को खिंचते हैं तो उन्हें 100 यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। अगर आप रथ यात्रा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं तो आप घर पर ही भगवान जगन्नाथ के मंत्रों का जप कर सकते हैं। जानें भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंत्र और स्रोत।

जगन्नाथ भगवान की पूजा घर पर कैसे करें

  • सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छे से साफ करें और गंगाजल से उसे शुद्ध कर दें। इसके बाद भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा स्थापित करें।
  • इसके बाद घी का दीपक जलाएं और धूर प्रजव्वलित करें।
  • अब भगवान को चंदन रोली, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
  • इसके बाद भगवान जगन्नाथ के मंत्र और स्तोत्र का जप करें।
  • इसके बाद भगवान को मालपुआ, फल और बिना प्याज लहसून से बने चीजों का भोग लगाएं।
  • अंत में भगवान जगन्नाथ की आरती करें।

जगन्नाथ गायत्री मंत्र
ओम जगन्नाथाय विद्महे।
महाबलाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

भगवान जगन्नाथ का मूल मंत्र
ओम श्री जगन्नाथाय नमः॥

श्री जगन्नाथ अष्टकम

कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः
रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥

महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥

कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥

रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥

परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥

न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥

हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥

जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।
सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥

जगन्नाथ स्तोत्र

तस्मात्तेनैव मन्त्रेण भक्त्या कृष्णं जगद्गुरुम्। सम्पूज्य गन्धपूष्पाद्यैः प्रणिपत्य प्रसादयेत् ॥
जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाघनाशन। जय चाणूरकेशिघ्न जय कंसनिषूदन ॥

जय पद्मपलाशाक्ष जय चक्रगदाधर। जय नीलाम्बुदश्याम जय सर्वसुखप्रद ॥
जय देव जगत्पूज्य जय संसारनाशन। जय लोकपते नाथ जय वाञ्छाफलप्रद ॥

संसारसागरे घोरे निःसारे दुःखफेनिले। अहं सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरषोत्तम ॥
नानारोगोर्मिक‌लिले मोहावर्तसुदुस्तरे। निमग्नोऽहं सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरुषोत्तम ॥