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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद तो पूरी दुनिया में तेल का संकट, क्या इस रूट का विकल्प है?

   अमेरिका और ईरान की जंग के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खींचातानी चल रही है. यह एक संकरा समुद्री क्षेत्र है जो ईरान के हिस्से में आता है. इस मार्ग से दुनिया भर की ऊर्जा आपूर्ति का करीब 25 फीसदी हिस्सा गुजरता है. युद्ध के बीच ईरान ने इस रास्ते में कुछ बाधा खड़ी कर दी है. मतलब, यह समुद्री मार्ग इस समय सुचारु ढंग से नहीं संचालित हो पा रहा है. अब सवाल है कि क्या इस रूट का कोई विकल्प है और यह दुनियाभर के लिए कितना जरूरी है?

इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज चर्चा में है. यह संकरा समुद्री क्षेत्र ईरान के हिस्से में आता है और पूरी दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. इस मार्ग से दुनिया भर की ऊर्जा आपूर्ति का करीब 25 फीसदी हिस्सा गुजरता है. युद्ध के बीच ईरान ने इस रास्ते में कुछ बाधा खड़ी कर दी है. मतलब, यह समुद्री मार्ग इस समय सुचारु ढंग से नहीं संचालित हो पा रहा है.

यह दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री ऊर्जा-मार्गों में से एक है. खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस बड़ी मात्रा में इसी संकरे जलडमरूमध्य से होकर वैश्विक बाजार तक पहुंचता है. जब भी होर्मुज बंद होने की आशंका उठती है, तो तेल की कीमतें, शिपिंग बीमा, और सप्लाई-चेन का पूरा तंत्र हिल जाता है.

होर्मुज स्ट्रेट.

सवाल यह है कि यदि यह मार्ग बाधित हो जाए, तो क्या वाकई पूरी दुनिया तेल संकट में चली जाएगी? क्या इस रूट का कोई व्यावहारिक विकल्प मौजूद नहीं है? आइए, विस्तार से जानते हैं.

होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

होर्मुज की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है. खाड़ी में बड़े तेल उत्पादक देश, सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई, कतर, ईरान, सब समुद्री निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं. यह रास्ता संकरा है. यहां जहाजों की आवाजाही खूब होती है. यह आए दिन सैन्य-राजनीतिक तनाव का केंद्र भी रहा है. इसलिए यहां जोखिम बढ़ते ही टैंकरों की आवाजाही धीमी हो जाती है. कुछ कंपनियां मार्ग बदल सकती हैं लेकिन बीमा प्रीमियम तुरंत बढ़ जाता है. कई बार पूरी तरह बंद होने से पहले ही तेल के दाम ऊपर पहुंच जाते हैं.

होर्मुज स्ट्रेट.

होर्मुज बाधित हो जाए तो कैसे पड़ता है असर?

तेल बाजार केवल वास्तविक आपूर्ति पर नहीं, अपेक्षाओं पर भी चलता है. यदि बड़े निर्यातकों का समुद्री शिपमेंट बाधित हो, तो तत्काल डिलीवरी वाले सौदों में तेजी आती है. ट्रेडर संभावित कमी को पहले ही कीमतों में जोड़ देते हैं. वार-रिस्क कवरेज बढ़ता है, टैंकर चार्टर रेट ऊपर चले जाते हैं. कच्चे तेल के साथ-साथ कई उत्पादों की कीमतें बढ़ती हैं. ऊर्जा महंगी होने से परिवहन, खाद्य आपूर्ति और उद्योग की लागत बढ़ती है.

क्या इस रूट का कोई विकल्प संभव नहीं?

विकल्प हैं, लेकिन उनकी क्षमता, भू-राजनीतिक जोखिम, और लागत सीमित करती है. मोटे तौर पर कुछ विकल्प हैं.

  • पाइपलाइन: इससे मामूली राहत तो मिलती है लेकिन पूरी भरपाई करने में सक्षम नहीं हैं. कुछ खाड़ी देशों ने होर्मुज पर निर्भरता घटाने के लिए पाइपलाइन नेटवर्क बनाए हैं. सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन खाड़ी से तेल को रेड सी तट तक ले जाकर टैंकरों से बाहर भेजने की क्षमता देती है. यूएई की पाइपलाइन से निर्यात का एक हिस्सा होर्मुज से बाहर, ओमान की खाड़ी के फुजैरा टर्मिनल से निकल सकता है. यह वैकल्पिक व्यवस्था आंशिक रूप से काम आती है. संकट की स्थिति में सबका तेल इन्हीं पाइप लाइनों से नहीं जा सकता. इनकी क्षमता सीमित है और सभी उत्पादक देशों के पास बराबर विकल्प नहीं हैं.
  • समुद्री रूट बदलना: इससे दूरी और लागत बढ़ती है. अगर होर्मुज से निकलना कठिन हो, तो कुछ शिपमेंट रेड सी या अन्य रूट की ओर बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन अतिरिक्त दूरी से फ्रेट लागत बढ़ती है. जहाजों की उपलब्धता और पोर्ट क्षमता सीमित हो सकती है. कुछ रास्तों पर दूसरे भू-राजनीतिक जोखिम भी हैं यानी रूट बदलना संभव है पर एक बटन दबाते ही वैश्विक सप्लाई पहले जैसी नहीं रह सकती.
  • रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक आपूर्ति: कई देशों के पास पेट्रोलियम रिजर्व होता है, जिन्हें आपात स्थिति में रिलीज किया जा सकता है. यह कदम बाजार को संदेश देता है कि तत्काल कमी से निपटा जा सकता है. अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से कुछ हफ्तों या महीनों तक सप्लाई बनाए रखा जा सकता है. यह कीमतों को अस्थायी स्थिरता देता है. साथ ही अमेरिका, ब्राजील, नॉर्वे, पश्चिम अफ्रीका आदि क्षेत्रों से अतिरिक्त सप्लाई बढ़ाने की कोशिश हो सकती है. लेकिन उत्पादन बढ़ाने में समय लगता है. मतलब, मांग-आपूर्ति में अंतर साफ दिखाई देने लगता है.
  • विकल्प है, पर स्केल नहीं

    होर्मुज का असली संकट यह नहीं कि रास्ता बिल्कुल बंद हो गया तो कुछ भी नहीं बचेगा. असली समस्या यह है कि जितनी मात्रा सामान्य दिनों में वहां से गुजरती है, उसे अचानक किसी एक-दो विकल्पों से पूरी तरह रिप्लेस करना लगभग असंभव है. इसलिए परिणाम अक्सर पूर्ण ब्लैकआउट से ज्यादा बड़ा व्यवधान, ऊंची कीमतें, और अनिश्चितता के रूप में दिखता है.

    नई नहर क्यों नहीं बन सकती?

    अक्सर यह सवाल सामने आता है कि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य अगर बंद हो जाए, तो इसके आसपास से जहाज़ों के लिए कोई नई नहर क्यों न बना दी जाए ताकि रास्ता खुला रहे? यह विचार सुनने में बेहद आकर्षक लगता है, लेकिन ज़मीन पर इसे लागू करने में अनेक कठिनाई है. इस दिशा में अलग-अलग समय पर योजनाएं और चर्चाएं हुईं, पर वे आगे नहीं बढ़ पाईं.

  • सबसे बड़ी रुकावट हैं भूगोल और पहाड़

    हॉर्मुज़ के पास मुसंदम प्रायद्वीप का क्षेत्र आता है, जहां हजार पर्वतमाला मौजूद है. यहां ऊंची-ऊंची चोटियां हैं और भू-भाग का बड़ा हिस्सा कठोर, ठोस चट्टानों वाला है. अगर इस इलाके से होकर नहर निकालनी हो, तो लंबी दूरी तक चट्टानों को काटकर समुद्र-स्तर की जलमार्ग संरचना बनानी पड़ेगी. यह इंजीनियरिंग के लिहाज़ से बहुत बड़ा और जोखिम भरा काम है और खर्चीला भी.

    कल्पना से कहीं अधिक आएगी लागत

    ऐसी किसी नहर के लिए बड़े पैमाने पर खुदाई, ब्लास्टिंग, सुरंग, कटिंग, तटबंध, लॉक सिस्टम, पोर्ट टर्मिनल, सुरक्षा ढांचा और रखरखाव चाहिए होगा. इसी वजह से इस तरह की परियोजना की अनुमानित लागत अत्यंत अधिक मानी जाती है. इतनी कि वह कई प्रमुख वैश्विक नहर-परियोजनाओं से भी भारी पड़ सकती है. साथ ही, केवल निर्माण ही नहीं, समय और वित्तपोषण भी बड़ी चुनौती बन सकते हैं.

    राजनीति और सहमति है दूसरी दीवार

    नहर केवल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं होती, यह सीमाओं, संप्रभुता, सुरक्षा और रणनीतिक नियंत्रण से जुड़ा मसला भी है. इस क्षेत्र में ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के अपने-अपने हित और चिंताएँ हैं. किसी एक रूट या कॉरिडोर पर सहमति बनाना, नियंत्रण का ढाँचा तय करना, सुरक्षा व्यवस्था तय करना, और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ संभालना आदि परियोजना को जटिल बना सकते हैं.

    एक वैकल्पिक सीधी नहर का विचार, लेकिन वही समस्या

    कभी-कभी एक दूसरे विकल्प की भी चर्चा होती है. अबू धाबी से सोहार की दिशा में एक अपेक्षाकृत सीधी नहर बन सकती है. पर, इस मार्ग में भी ऊंचा-नीचा पर्वतीय भू-भाग और कठिन भूगोल सामने आता है. नतीजा यह कि तकनीकी जटिलता और अनुमानित खर्च यहाँ भी बहुत बढ़ जाता है और परियोजना की व्यवहारिकता पर सवाल खड़े हो जाते हैं.

    कूटनीतिक भूमिका और क्षेत्रीय संतुलन

    ओमान को अक्सर क्षेत्रीय तनावों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाला देश माना जाता है. ऐसे में कोई भी विशाल, रणनीतिक नहर-परियोजना केवल आर्थिक पहल नहीं रह जाती. उसके भू-राजनीतिक संकेत और सुरक्षा प्रभाव भी होते हैं. इसी कारण व्यापक सहमति बनना और भी मुश्किल हो सकता है. हॉर्मुज़ के आसपास नहर बनाना कागज़ पर समाधान जैसा लगता है, लेकिन वास्तविक दुनिया में यह कठिन भूगोल, बेहद ऊंची लागत और बहु-देशीय राजनीतिक सहमति की वजह से अत्यंत चुनौतीपूर्ण है.

    भारत जैसे आयातक देशों पर क्या असर?

    भारत जैसे देश के लिए होर्मुज संकट का असर कई स्तरों पर पड़ सकता है. आयात लागत बढ़ने से चालू खाता दबाव में आता है. सरकार टैक्स समायोजन करे या कीमत बढ़े, दोनों की अपनी चुनौतियां हैं. उच्च आयात बिल से मुद्रा पर दबाव बन सकता है. परिवहन, उर्वरक, केमिकल, एविएशन, सभी क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है. भारत के लिए रणनीति आमतौर पर स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक भंडार, रिफाइनरी लचीलापन, और कूटनीतिक स्थिरता प्रयास का मिश्रण होती है.

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित होने पर दुनिया में तेल संकट जैसी स्थिति बन सकती है, लेकिन विकल्प बिल्कुल नहीं है, यह सही नहीं माना जा सकता. विकल्प के रूप में पाइपलाइन, वैकल्पिक समुद्री निर्यात बिंदु, रणनीतिक भंडार और अन्य क्षेत्रों से आपूर्ति आदि हैं. पर, वे होर्मुज के बराबर पैमाने पर तुरंत काम नहीं कर सकते. इसलिए वास्तविकता यह है कि होर्मुज में बड़ा व्यवधान वैश्विक बाजार में तेज कीमत वृद्धि, सप्लाई अनिश्चितता और आर्थिक दबाव पैदा कर सकता है.

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