जीवेत शरद शत म का आशीर्वाद भारत वर्ष में अत्यंत लोकप्रिय और प्रयोग में लाया जाने वाला वाक्य है किंतु आधुनिक युग में लोगों को सहज भरोसा नहीं होता कि वे सौ वर्षों तक जिंदा रह सकते हैं। आशीर्वाद तो महज आशीर्वाद है इस आपाधापी के युग में निरोग और स्वस्थ रहकर सौ बरस तक नहीं जिया जा सकता।

हालांकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी आविष्कारों ने लोगों के जीने की औसत आयु लंबी कर दी है पर निरोग रहकर जीना एक दुरूह और मुश्किल भरा काम है।जीवन जीने की शैली एकदम बदल गई है।समय प्रबंधन आज के युवाओं में है नहीं।आज का जमाना उलट सा गया है।आप स्वयं अपने घरों में देख सकते हैं कि परिवार में जब कोई शिशु जन्म लेता है तो उसके पालने का तरीका और उसे स्वस्थ रखने का उपाय परिवार में न खोजकर बाजार में खोजा जाता है।
कुछ दिन वह मां से फीडिंग तो पाता है पर फिर बाजार के दूध और पावडर पर निर्भर हो जाता है।आधुनिक मां बाप बच्चे को धूल में नहीं उतरने देते।उसके हाथ पावं में मिट्टी नहीं लगनी चाहिए।बहुत से परिवारों में तो आया ही मां की भूमिका निभाती है।खैर यह तो लालन पालन की बात हुई।
आइए अब देखते हैं उसके बचपनवास्था में खाने की शैली।खाने में मैगी,चाउमीन, बर्गर,पिज्जा,सोया चाट,मंचूरियन,मैक्रोनी,इत्यादि फास्ट फूड उसका पसंदीदा आहार होता है।घर में शुद्ध भोज्य पदार्थ बन नहीं पाता जिसके अनेक कारण हैं।कहां से उसे शुद्ध भोजन मिलेगा।एक तरफ वह आबादी है जो सिर्फ मां के दूध को पाकर बढ़ती है,धूल में खेलकर बड़ी होती है, सूखी रोटी में नमक लगाकर आधा तिहाई पेट भरती है,दिन भर शारीरिक श्रम करती है और स्वस्थ रहती है।मजबूत रहती है।
इस तरह जो समाज तैयार होता है उसे हम तीन वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं।एक कृषक और मजदूर समाज,दूसरा व्यावसायिक और वाणिज्यिक समाज और तीसरा नौकरीपेशा समाज।इन तीनों समाजों पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि नौकरीपेशा समाज एक तरह से निश्चिंत समाज होता है जहां हर माह उसे एक निश्चित आय प्राप्त हो जाती है और वह उस निश्चित आय के हिसाब से अपने और अपने परिवार को चलाने का अभिकल्प बना लेता है।इतना हिस्सा खाने पर इतना शिक्षा पर इतना घर खर्च पर और इतना सेविंग पर।इस तरह वह हर माह वेतन को खर्च करने के तरीके को सेट करके अपने भविष्य के प्रति निश्चिंत हो जाता है।
आइए अब दूसरे समाज को देखें जो व्यवसाय और वाणिज्य से जुड़ा होता है।इस वर्ग में छोटे से छोटा दुकानदार और बड़ा से बड़ा उद्योगपति आता है।इनमें रिस्क उठाने की क्षमता अन्यों की तुलना में अधिक होती है।क्योंकि व्यवसाय और उद्योग में भी गणित अधिक उपयोग में लाया जाता है।बिना गुणा भाग किए व्यवसाय चलता नहीं है।
तीसरा वर्ग किसान और मजदूर का होता है।यह ऐसा वर्ग है जो पूर्णतः भाग्य भरोसे अनिश्चितता में जीवन यापन करता है।इनके आय का कोई निश्चित स्रोत नहीं है।किसान खेत में काम करता है और खेती एक मेहनतकश काम है।फसल लगाता है पर फसल के ऊपर बाढ़ का प्रकोप,सूखे का प्रकोप और ओले का प्रकोप लगातार बना रहता है।यदि भाग्य भरोसे अनाज हो गया तो उसकी गाड़ी चलने लगती है अन्यथा वह कर्ज में डूबा ही रहता है।वही स्थिति मजदूर की है काम मिल गया तो मजदूरी मिल गई नहीं मिला तो ठन ठन गोपाल।यह जीवन पूर्णतः अनिश्चितताओं से भरा होता है।
अब तीनों वर्गों की जिम्मेदारियों को देखिए। ज़िम्मेदारियां शादी करना,बच्चों को पालना,उन्हें शिक्षा देना,उनकी शादी इत्यादि करना ,एक मकान बनाना,एक छोटी मोटी गाड़ी खरीदना,जीवन मरण के संस्कारों का निर्वहन होती हैं।यह कार्य सभी को करना है।कौन किस तरह करता है आप रोज देखते हैं पर कितना तनाव मुक्त होकर करता है कितनी शांति से करता है और अपने जीवन को कितने आत्मविश्वास से जीता है यह महत्वपूर्ण है।
मेडिसिन पर सर्वाधिक खर्च नौकरीपेशा और व्यवसायियों का होता है।तनाव और चिंता भी इन्हीं वर्ग को अधिक होती है जबकि किसान और मजदूर राम भरोसे होते हैं।काम सभी को समान ही करना है पर बीपी,शुगर,चिंता,तनाव,हृदयरोग, उन लोगों को अधिक होता है जिनकी एक निश्चित आय है और उन्होंने जीवन और परिवार चलाने का एक निश्चित रास्ता बना रखा है अर्थात निश्चिंतता में अनिश्चितता यह एक चिंतनीय मुद्दा है जबकि जिनकी जिंदगी में अनिश्चितता है अर्थात आय का स्रोत भगवान भरोसे है उनमें उपरोक्त समस्याएं भी कम देखने को मिलती हैं।
मृत्यु दर व्यवसायियों में अधिक,उससे कम नौकरीपेशा में और सबसे कम किसानों और मजदूरों में देखी जाती है।मृत्यु सभी की होती है पर एक निश्चित समय के बाद।लेकिन जो भगवान भरोसे या अनिश्चितता में जीने का रास्ता खोज लेता है उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करता है।ढेर सारे पैसे रखकर हम निश्चिंत नहीं हो सकते निश्चिंत हम तब होंगे जब हम ईश्वर में अपनी आस्था रखें।ईश्वर में आस्था रखने वालों की रक्षा ईश्वर ही करता है।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं………
अनन्या चिंतयंतों मां ये जना पर्यु पास्ते।
तेशाम नित्य अभियुक्तनांम योग क्षेमम वहाम्याह्ं।।
इस तरह अनिश्चितता में जीवन जीना और ईश्वर में आस्था और विश्वास करके हम जीवन को निश्चिंत बना सकते हैं।हालांकि बहुत से ऐसे लोग हैं जो यह तर्क दे सकते हैं कि नौकरीपेशा और व्यावसायिक वर्ग को मानसिक कार्य अधिक करने पड़ते है इसलिए वे मनोशारीरिक विकृतियों के शिकार अधिक होते हैं और किसान तथा मजदूर वर्ग शारीरिक श्रम अधिक करते हैं इसलिए वे स्वस्थ रहते हैं।यह एक कारण हो सकता है पर सभी प्रकरणों पर यह समान रूप से लागू नहीं हो सकता।आंकड़े तो यही कहते हैं कि ईश्वर पर भरोसा रखो सभी कार्य पूर्ण होंगे।