पड़ोसी देश बांग्लादेश में इस वक्त जो हालात चल रहे हैं, उसे देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यहां लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह गया है. किसी तरह देश में चुनाव का तो ऐलान हो गया है लेकिन अब इस बात पर भी संशय है कि हिंसा के शिकार हो रहे अल्पसंख्यकों को वोट देने को भी मिलेगा या नहीं.
ढाका: बांग्लादेश में पिछले एक साल से जिस तरह के अस्थिर हालात चल रहे हैं, उसे लेकर उम्मीद की जा रही थी कि चुनाव के बाद माहौल सुधरेगा. हालांकि अब चुनाव की तारीखों का तो ऐलान हो गया है लेकिन स्थिति ये है कि समाज के जिस तबके पर सबसे ज्यादा अत्याचार हो रहा है, उसकी लोकतंत्र में भागीदारी भी मुश्किल हो गई है. चुनाव को लेकर आगामी राष्ट्रीय चुनाव से पहले बांग्लादेश में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यक समुदायों में अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता है. यह बात बांग्लादेश हिंदू-बौद्ध-ईसाई ओइक्या परिषद ने कही है.
परिषद के कार्यवाहक महासचिव मणिंद्र कुमार नाथ ने कहा कि स्थानीय या राष्ट्रीय चुनावों के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को सिर्फ वोट देने या किसी उम्मीदवार के पक्ष–विपक्ष में खड़े होने के कारण धमकियां, हमले और तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. अगर सरकार और चुनाव आयोग उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाए, तो अल्पसंख्यक मतदाता मतदान केंद्रों तक जाने से डर सकते हैं.
हिंदुओं और अल्पसंख्यकों का मतदान अधिकार खतरे में
ढाका के CIRDAP सभागार में आयोजित एक गोलमेज बैठक में मणिंद्र कुमार नाथ ने कहा कि कुछ समूह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं और राजनीति में धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे चुनाव के समय सुरक्षा को लेकर माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया है. नाथ ने यह भी बताया कि अंतरिम सरकार के कार्यकाल में भी देश के अलग-अलग हिस्सों में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा हुई है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक 4 अगस्त से 31 दिसंबर 2024 के बीच 2,184 और 1 जनवरी से 30 नवंबर 2025 के बीच 489 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं. ये धार्मिक, जातीय अल्पसंख्यकों और आदिवासी लोगों के खिलाफ दर्ज की गईं. सिर्फ दिसंबर महीने में ही हत्या की पांच घटनाएं सामने आईं, जिसने दहला दिया.
इस बैठक में मयमनसिंह के भालुका में दीपू चंद्र दास की बर्बर हत्या का जिक्र किया गया, जिसे कथित तौर पर ईशनिंदा के आरोप में मार दिया गया. इसके बाद उसके शव को पेड़ से लटकाकर जला दिया गया. इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था. नाथ ने आरोप लगाया कि सरकार कई बार इन घटनाओं को राजनीतिक बताकर संगठित हिंसा से इनकार करती है, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों की न्याय की उम्मीद भी खत्म हो जाती है.
अर्थशास्त्री देबप्रिय भट्टाचार्य ने कहा कि धर्म के आधार पर की जाने वाली राजनीति देश की एकता, समाज और अर्थव्यवस्था को कमजोर करती है और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंचा सकती है. वहीं ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश के प्रमुख इफ्तेखारुज्जमान ने कहा कि अल्पसंख्यकों पर हमलों के पीछे असली वजह राजनीति, जमीन कब्जा और दबदबा कायम करना है. उन्होंने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों के लिए डाइवर्सिटी कमीशन बनाने और भेदभाव विरोधी कानून को लागू करने की मांग की
