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“राष्ट्र साधना के महातपस्वी : बाल गंगाधर तिलक”

170वीं जयंती पर भावपूर्ण आदरांजलि… कोटि-कोटि वंदन !!
     लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक… वह नाम, जो राष्ट्रप्रेम के पर्याय के रूप में भारतीय जनमानस की स्मृतियों में अमर हो चुका है। मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा, गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकने की उद्विग्नता और स्वराज्य प्राप्ति के लिए सर्वस्व समर्पण की भावना के प्रतीक… तुष्टिकरण और देशविरोधी राजनीतिक षड्यंत्रों के खिलाफ सबसे प्रखर, सबसे मुखर आवाज… जिसे सुनकर हृदय में देशभक्ति का तूफान उठता था, नौजवानों की भुजाएं फड़कने लगती थीं और लहू गर्म हो उठता था।
तिलक ने ही पहली बार स्वर दिया, “स्वराज हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे, आणि मी तो मिळवणारच” (स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा)। वे भारतीय संस्कृति के सर्वोत्तम गुणों के प्रतीक थे और इन्हीं गुणों के कारण ‘लोकमान्य’ से ‘भगवान’ तिलक हो गए। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को राष्ट्रवाद की ज्वाला दी… न झुके, न डिगे, न बिके !!
क्रांतिकारी विचार, आक्रामक शैली और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के कारण तिलक देश के स्वातंत्र्य प्रेमी युवाओं के प्रेरणास्त्रोत गए। आजादी की लड़ाई में अहिंसा को राष्ट्रीय नीति के रूप में अपनाए जाने से वे पूरी तरह सहमत नहीं थे। उनका कहना था, “मैं तो सशस्त्र विद्रोह को भी संवैधानिक मानता हूं। अगर मुझे इतना भी आश्वासन मिल जाए कि सशस्त्र विद्रोह को सोलह में से आठ आने तक सफलता मिल जाएगी तो मैं विद्रोह शुरू कर दूंगा और परिणाम ईश्वर पर छोड़ दूंगा।”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के आदर्श तिलक ही थे। उनके कमरे में दो ही चित्र थे – एक छत्रपति शिवाजी का और दूसरा लोकमान्य तिलक का। छोटी उम्र से ही वे ‘केसरी’ नियमित रूप से पढ़ने लगे और अपने सहपाठियों को भी पढ़कर सुनाते। बाल गंगाधर तिलक का मूल नाम भी केशव था। बाल घरेलू नाम था, लेकिन वही आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।
‘केसरी’ में ब्रिटिश विरोधी लेख लिखने के कारण तिलक को राजद्रोह के आरोप में कालापानी की सजा सुनाई गई। मुकदमे की सुनवाई के दौरान जज ने कहा कि उनके सामने ऐसे व्यक्ति को अभियुक्त बनाया गया है, जो न्यायाधीश से अधिक विद्वान है। सजा काटकर लौटने के बाद भी तिलक निर्भय होकर पहले की तरह लिखते रहे।
असहयोग आंदोलन की सफलता को लेकर भी तिलक आश्वस्त नहीं थे। उस समय तक वे कांग्रेस से काफी दूरी बना चुके थे। कांग्रेस में तुष्टिकरण की नीति हावी हो रही थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश राज द्वारा पद से हटाए गए तुर्की के खलीफा के समर्थन में भारतीय मुसलमानों का एकजुट होना उस कालखंड की बड़ी घटना थी। उसी दौरान गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन के साथ खिलाफत आंदोलन को भी जोड़ दिया। तिलक इससे सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि आंदोलन का परिणाम यह होगा कि गांधीजी और अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। फिर जनता का मुद्दा बदल जाएगा और ब्रिटिश राज शासन सुधार के असली मुद्दों पर अमल करने के बजाए नेताओं को रिहा करके ही जनता को शांत कर देगा।
    तिलक ने न सिर्फ अपनी लेखनी से क्रांतिकारियों का वैचारिक समर्थन किया, बल्कि गुप्त तरीकों से उनकी मदद भी करते थे। कई बार क्रांतिकारियों की उन्होंने रक्षा भी की। गणेशोत्सव और शिवाजी जन्मदिवस समारोह के माध्यम से उन्होंने जनसाधारण को स्वाभिमान तथा स्वराज्य का संदेश दिया।
जिस अर्धरात्रि को उनका देहावसान हुआ, वे जाते-जाते सन्निपात में यही कह रहे थे, “मुझे पूरा विश्वास है और आप लोग भी यकीन मानिए कि हिंदुस्तान को स्वराज्य अवश्य मिलेगा। इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है।” भारत की जनशक्ति के प्रति अटूट विश्वास से भरे उनके आखिरी वाक्य इतिहास की कसौटी पर खरे सिद्ध हुए।
भारत माता की महान संतान की पावन स्मृतियों को सादर नमन !!
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