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ग्रामोदय विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

      व्याख्यान और विचार मंथन से भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सतत पर्यावरण विषय को मिली नई दिशा
        चित्रकूट । महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ आज वाल्मीकि सभागार में हुआ। 
भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सतत पर्यावरण संगोष्ठी का विषय रखा गया है। पदमश्री महेश शर्मा, झाबुआ  उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि रहे। अध्यक्षता कुलगुरु प्रो भरत मिश्रा ने की। दीनदयाल सोच संस्थान के राष्ट्रीय संगठन सचिव अभय महाजन ने विषय प्रवर्तन एवं मुख्य वक्तव्य दिया। विशिष्ट अतिथि के रूप में पदमश्री बाबूलाल  दाहिया, सतना एवं उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ श्याम बिहारी गुप्ता ने अपने व्याख्यान के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव साझा किया। पर्यावरण क्षेत्र के  धरातलीय कार्यों में लगे डॉ नीलेश भाई सोलंकी, डॉ  अनिल कुमार एवं डॉ रविंद्र मोरे, अध्यक्ष बाल संरक्षण आयोग मध्य प्रदेश मंचासीन रहे।
          इस मौके पर मुख्य अतिथि पदमश्री डॉ महेश शर्मा ने कुलगुरु प्रो भरत मिश्रा को फेलोशिप अवार्ड, डॉ राजीव राठौर को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड एवं अर्चना उपाध्याय को पब्लिक आउट रिच अवार्ड से सम्मानित किया। संगोष्ठी संयोजक डॉ उमेश कुमार शुक्ल द्वारा संपादित सेमिनार स्मारिका , प्रोसीडिंग्स, भारतीय ज्ञान परंपरा पर केंद्रित पुस्तकों का विमोचन किया गया। इस मौके पर विद्यार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर केंद्रित प्रदर्शनी भी लगाई थी।
 उद्घाटन सत्र में विषय प्रवर्तन करते हुए मुख्य वक्ता अभय महाजन, राष्ट्रीय संगठन दीन दयाल शोध संस्थान ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सतत पर्यावरण की दिशा में किये जा रहे इस राष्ट्रीय आयोजन के महत्व और प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि हमें अपनी जड़ों और परंपराओं को जानना,पहचानना चाहिए। उन्होंने महा पुरुषों द्वारा बताए गए रास्ते पर चलने का आवाहन करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदैव से पर्यावरण की पोषक रही है। श्री महाजन ने नाना जी देशमुख द्वारा स्थापित दीन दयाल शोध संस्थान और अंगीकृत प्रकल्पों के कार्यों पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि पदमश्री महेश शर्मा ने भारतीय ज्ञान परंपरा को संस्कृति और विरासत से जोड़ते हुए कहा कि हमारे वेदों में भारतीय संस्कृति का चिंतन उल्लिखित है। हमारे ज्ञान परंपरा में आसक्ति को विनाश का कारण बताया गया है।  उपभोग करें किंतु संग्रह न करने की सीख हमारे पूर्वजों ने दी है। पदमश्री शर्मा ने कहा कि ज्ञान परंपरा में मनुष्य को जीवन जीने की कला बताई गई है।  उन्होंने चित्रकूट में ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना को नाना जी की सकारात्मक सोच का परिणाम बताते हुए कहा कि ग्रामोदय विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप है।
     विशिष्ट अतिथि पदमश्री बाबूलाल दाहिया ने  कहा ग्रामीणों को पर्यावरण संरक्षण का ज्ञान था। उन्होंने काव्य शैली में किसानों के कार्य और उनके अनुभव को बताया। पद्मश्री दाहिया ने गांव के पास अनुभव जनित ज्ञान का भंडार था। हमारी ग्रामीण लोक परम्परा को भारतीय ज्ञान परंपरा के रूप में मानते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि श्याम बिहारी गुप्ता, अध्यक्ष गौ सेवा आयोग उत्तर प्रदेश ने नाना जी के कार्यों को याद करते हुए कहा कि गाय, खेती और उद्योग को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करना चाहिए। श्री गुप्ता ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में सदैव  पर्यावरण संरक्षण के उपाय बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय विकास का  आधार खेत है। गाय और खेती के माध्यम से भारतीय किसान  विकसित भारत 2047 में अपना सशक्त योगदान देंगे।
     अध्यक्षीय व्याख्यान देते हुए कुलगुरु प्रो भरत मिश्रा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सतत पर्यावरण विषय को लेकर हुए व्याख्यान और विचार मंथन ने चिंतन को एक नई दिशा प्रदान की है। प्रो भरत मिश्रा ने पर्यावरण के क्षेत्र में किए जा योगदान और विश्वविद्यालय की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। आभार प्रदर्शन अधिष्ठाता कृषि प्रो डी पी राय ने किया। सत्र का सफल संचालन डॉ ललित कुमार सिंह ने किया। कार्यक्रम का संयोजन आयोजन सचिव डॉ उमेश कुमार शुक्ल ने किया।इस अवसर ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलसचिव,संकायों के अधिष्ठाता, विभागाध्यक्ष, निदेशक, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी, छात्र छात्राओं ने सहभागिता की।
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