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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस:राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख की कल्पना को साकार करता एक अनूठा जन-अभियान डॉ. जय प्रकाश शुक्ल

चित्रकूट मॉडल : जब योग बना सामाजिक एकात्मता का सेतु राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख की कल्पना को साकार करता एक अनूठा जन-अभियान डॉ. जय प्रकाश शुक्ल

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज विश्वव्यापी आयोजन बन चुका है। करोड़ों लोग योग को स्वास्थ्य, संतुलन और मानसिक शांति का माध्यम मानकर उससे जुड़ रहे हैं। देश-विदेश में हजारों कार्यक्रम आयोजित होते हैं, किंतु कुछ आयोजन ऐसे भी होते हैं जो केवल योगाभ्यास तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज निर्माण, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और जनभागीदारी के नए प्रतिमान स्थापित करते हैं। चित्रकूट में आयोजित सामूहिक योग कार्यक्रम ऐसा ही एक प्रेरक उदाहरण है। 21 जून 2026 को महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का सामूहिक कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था।

डॉ. जय प्रकाश शुक्ल

यह चित्रकूट की सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक एकात्मता और सामूहिक शक्ति का ऐसा उत्सव था जिसमें मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र के 111 योग केंद्रों से एक हजार से अधिक योग साधक एकत्र हुए। संत समाज, सामाजिक संस्थाएँ, शैक्षणिक परिसर, स्थानीय निकाय, ग्राम समुदाय और नागरिक समाज के प्रतिनिधि एक मंच पर उपस्थित थे। यह दृश्य केवल योग का नहीं, बल्कि समाज की संगठित शक्ति का प्रतीक था। योग से समाज को जोड़ने की परिकल्पना योग का अर्थ केवल शरीर को स्वस्थ रखना नहीं है।

भारतीय दर्शन में योग का वास्तविक अर्थ है—जोड़ना। व्यक्ति का स्वयं से, समाज का समाज से और मनुष्य का व्यापक मानवता से जुड़ना। चित्रकूट में योग दिवस का आयोजन इसी व्यापक अर्थ को मूर्त रूप देता है। दीनदयाल शोध संस्थान के राष्ट्रीय संगठन सचिव श्री अभय महाजन के मार्गदर्शन में पिछले कई वर्षों से चित्रकूट क्षेत्र में योग को जन-अभियान के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।

इसकी विशेषता यह है कि कार्यक्रम किसी एक संस्था का नहीं होता, बल्कि संपूर्ण समाज का सामूहिक आयोजन बन जाता है। योग दिवस से पूर्व आरोग्यधाम में प्रशिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बाद चित्रकूट क्षेत्र के सैकड़ों स्थानों पर एक सप्ताह तक नियमित योगाभ्यास कराया जाता है। जब अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आता है तो विभिन्न केंद्रों के योग साधक एक स्थान पर एकत्र होकर सामूहिक योग करते हैं। यह व्यवस्था योग को कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान करती है। राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख की जीवंत विरासत चित्रकूट का यह प्रयोग राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख के जीवन दर्शन को समझे बिना पूर्णतः नहीं समझा जा सकता।

नानाजी देशमुख का विश्वास था कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी संगठित चेतना में निहित होती है। वे मानते थे कि विकास केवल शासन के माध्यम से नहीं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी से संभव है। चित्रकूट में उन्होंने जो ग्रामोदय मॉडल विकसित किया, उसका मूल तत्व था—सहयोग, समन्वय और आत्मीय सहभागिता। आज जब चित्रकूट के संत-महात्मा, शिक्षण संस्थान, ग्राम पंचायतें, सामाजिक संगठन, प्रशासन और आम नागरिक एक साथ योग करते दिखाई देते हैं, तब यह नानाजी की उसी कल्पना का साकार रूप प्रतीत होता है जिसमें समाज स्वयं अपने सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान का वाहक बनता है। सीमाओं से परे सांस्कृतिक एकात्मता चित्रकूट की एक विशिष्ट पहचान यह भी है कि यह दो राज्यों—मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश—में विस्तृत सांस्कृतिक क्षेत्र है। प्रशासनिक सीमाएँ भले ही अलग हों, किंतु इसकी सांस्कृतिक चेतना सदियों से एक रही है।

योग दिवस के अवसर पर जब दोनों राज्यों के 111 केंद्रों से साधक एकत्र होकर एक साथ योगाभ्यास करते हैं, तब यह केवल स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं रह जाता, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उत्सव बन जाता है। यह आयोजन बताता है कि भारतीय संस्कृति का आधार राजनीतिक सीमाएँ नहीं, बल्कि साझा मूल्य, परंपराएँ और जीवन दृष्टि है। संत समाज की सक्रिय सहभागिता चित्रकूट की आध्यात्मिक पहचान उसके संत समाज से जुड़ी है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के इस आयोजन में विभिन्न मठों, मंदिरों और आश्रमों के संत-महात्माओं की सक्रिय सहभागिता विशेष महत्व रखती है। संतोषी अखाड़ा, भरत मंदिर, कामतानाथ मुखारविंद, गायत्री शक्तिपीठ तथा अन्य धार्मिक संस्थाओं के संतों ने योग को भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए इसे जीवन का अनिवार्य अंग बनाने का संदेश दिया। इससे कार्यक्रम को केवल शारीरिक स्वास्थ्य अभियान के बजाय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार भी प्राप्त हुआ। जनभागीदारी का अद्वितीय उदाहरण आज अनेक सामाजिक अभियानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनसहभागिता की होती है। चित्रकूट का योग मॉडल इस चुनौती का सफल समाधान प्रस्तुत करता है।

यहाँ योग दिवस की तैयारी केवल मंच और कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहती। प्रशिक्षकों का निर्माण, ग्राम स्तर तक पहुँच, स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी, संत समाज का मार्गदर्शन, शैक्षणिक परिसरों का सहयोग और नागरिकों की सक्रिय उपस्थिति—ये सभी मिलकर इसे वास्तविक जन-अभियान का स्वरूप देते हैं। यही कारण है कि चित्रकूट का यह प्रयोग केवल योग दिवस का आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक पूंजी निर्माण का माध्यम बन गया है। भविष्य के लिए एक प्रेरक मॉडल आज जब पूरी दुनिया तनाव, असंतुलित जीवनशैली और सामाजिक विखंडन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब चित्रकूट का यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। योग केवल व्यक्ति को स्वस्थ बनाने का साधन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम भी बन सकता है। चित्रकूट ने यह सिद्ध किया है कि यदि समाज, संस्थाएँ और नेतृत्व एक साझा उद्देश्य के साथ आगे बढ़ें तो योग को जन-स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक जागरण के प्रभावी उपकरण के रूप में विकसित किया जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 का यह आयोजन इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है कि उसने योग को मंच से उतारकर समाज के बीच स्थापित किया है। यही चित्रकूट मॉडल की सबसे बड़ी सफलता है और यही राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख की उस कल्पना का साकार स्वरूप भी है, जिसमें समाज स्वयं अपने विकास, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का नेतृत्व करता है। चित्रकूट का यह प्रयोग केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक संदेश है—योग जोड़ता है, समाज को संगठित करता है और राष्ट्र निर्माण की दिशा में नई ऊर्जा प्रदान करता है।

लेखक महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में जनसम्पर्क अधिकारी है

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