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गैलिलियो की माफी बनाम ईसाइयत का विज्ञान !!

गैलीलियो ने कहा था कि न कोई सूर्यास्त होता है, न कोई सूर्योदय। धारणा यह थी कि सूरज चक्कर लगाता है पृथ्वी के। और गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी चक्कर लगाती है सूरज के। बात ही बदल दी। सारी दुनिया मानती थी एक बात और गैलीलियो ने लिखी दूसरी ही बात।         महानिंदा हुई। कैथलिक पोप ने उसे रोम बुलाया और कहा, तुम माफी मांग लो। वह बूढ़ा हो चुका था–पचहत्तर साल का हो चुका था। बीमार था और कहा कि तुम क्षमा मांग लो, अन्यथा मरने के लिए तैयार हो जाओ।

अरुण सिंह (संपादक)

गैलीलियो बड़ा समझदार आदमी रहा होगा। बहुत कम लोगों ने उसकी समझदारी की प्रशंसा की है। लोग समझते हैं वह कायर था, क्योंकि उसने क्षमा मांग ली। मैं ऐसा नहीं समझता, क्योंकि क्षमा उसने इस ढंग से मांगी कि वह कायरता नहीं बताती। वह उस आदमी की समझदारी बताती है और वह उस आदमी की इतनी गहरी समझदारी बताती है कि पोप और उनका पूरा का पूरा मंडल जो निर्णायक बना बैठा था, उसकी मूर्खता सिद्ध होती है।

गैलीलियो ने कहा कि आप कहें तो अभी क्षमा मांग लूं। मुझे क्या अड़चन है! अरे, मुझे लेना-देना क्या! मैं लिख दूंगा अपनी किताब में कि पृथ्वी चक्कर नहीं लगाती, सूरज ही चक्कर लगाता है। पोप प्रसन्न हुआ, उसका मंडल प्रसन्न हुआ।

गैलीलियो ने खड़े होकर कहा, लेकिन एक बात खयाल रहे, मेरे लिखने से कुछ भी न होगा। चक्कर तो पृथ्वी ही लगाती है। मैं लिख दूंगा, मुझे लिखने में कोई अड़चन नहीं। मैं क्यों झंझट में पडूं, मुझे क्या लेना-देना, पृथ्वी लगाए चक्कर कि सूरज लगाए चक्कर। मगर इतना मैं कहे देता हूं, मेरे लिखने से कुछ बदलाहट होगी नहीं, बात कुछ बनेगी नहीं। लाख मेरे जैसे गैलीलियो लिखते रहें कि सूरज चक्कर लगाता है, सूरज सुनेगा नहीं और तुम सूरज को सजा भी नहीं दे सकते। तुम उसे अदालत में भी नहीं ला सकते। मैं तो घुटने टेक कर क्षमा मांगता हूं कि मुझे माफ कर दो, न मालूम किस पागलपन में मैंने यह बात लिख दी।

सच्ची बातें कहनी ही नहीं चाहिए। सच्ची बातें कहने का परिणाम बुरा होता है, यह तो मैंने सुना था, आज देख भी लिया। मैं माफी मांगता हूं और मैं लिखता हूं कि सूरज चक्कर लगाता है। मगर फिर भी जाते-जाते मैं कह जाता हूं, ध्यान रखना, मेरी सूरज मानता नहीं, पृथ्वी मेरी मानती नहीं। चक्कर तो पृथ्वी ही लगाती है और लगाती रहेगी।

यह आदमी अदभुत सूझ-बूझ का आदमी रहा होगा। इसने क्या व्यंग्य किया, गहरा व्यंग्य किया! माफी भी मांग ली और उन बुद्धुओं को बुद्धू भी साबित कर दिया। लेकिन आज हम जानते हैं कि गैलीलियो सही था। यह सनातन कथा है कि बहुत बार कांच कंचन होने का दावा करता है। और भीड़ को जंचती है यह बात, क्योंकि कांच सस्ता मिल जाता है, बिना कीमत चुकाए मिल जाता है।

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