भारत और चीन के बीच बांध निर्माण की होड़ न सिर्फ क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकती है, बल्कि ब्रह्मपुत्र नदी और उस पर निर्भर लाखों लोगों के भविष्य को भी खतरे में डाल सकती है।
चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर एक बेहद बड़े जलविद्युत परियोजना को आगे बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों और अधिकारियों का कहना है कि इस परियोजना से भारत में नीचे की ओर जल सुरक्षा, पर्यावरण और लोगों की आजीविका पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। यही नदी भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से दाखिल होती है और इसके प्राकृतिक प्रवाह पर किसी भी बड़े स्तर का हस्तक्षेप करोड़ों लोगों के लिए जोखिम माना जा रहा है। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 168 अरब डॉलर की इस प्रस्तावित परियोजना में लगभग 2,000 मीटर की ऊंचाई के अंतर का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए कई बांध, जलाशय, सुरंगें और भूमिगत बिजलीघर बनाए जाने की योजना है।
भारत की चिंता केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं
भारत की चिंता केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यह परियोजना एक ‘टिकिंग वॉटर बम’ बन सकती है। उनका कहना है कि इससे चीन ब्रह्मपुत्र में पानी छोड़ने या रोकने के समय और मात्रा को नियंत्रित कर सकता है। अचानक पानी छोड़े जाने से बाढ़ आ सकती है, जबकि पानी रोके जाने से अहम समय पर नदी के बड़े हिस्से सूख सकते हैं।
सरकार की ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े सभी घटनाक्रमों पर नजर
अगस्त में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने इस परियोजना पर बयान जारी करते हुए कहा था कि सरकार ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े सभी घटनाक्रमों पर लगातार नजर रखे हुए है। विदेश मंत्रालय ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि चीन द्वारा तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से में मेगा डैम के निर्माण से जुड़ी खबरों पर सरकार ने संज्ञान लिया है। मंत्रालय के मुताबिक, इस परियोजना की जानकारी पहली बार 1986 में सामने आई थी और तब से चीन इसकी तैयारियों में जुटा हुआ है।
जरूरत पड़ने पर एक्शन लेगा भारत
विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि सरकार क्षेत्र में भारत के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने कहा कि ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े सभी विकास कार्यों, खासकर चीन की जलविद्युत योजनाओं पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर निवारक व सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे, ताकि नीचे की ओर रहने वाले भारतीय नागरिकों की जान और आजीविका सुरक्षित रहे।
असम और अरुणाचल प्रदेश पर खतरा अधिक
हालांकि ब्रह्मपुत्र का अधिकांश पानी भारत के भीतर मॉनसूनी बारिश और सहायक नदियों से आता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऊपर की ओर छेड़छाड़ से नदी की प्राकृतिक लय प्रभावित हो सकती है। इससे असम और अरुणाचल प्रदेश के उपजाऊ बाढ़ क्षेत्र, मत्स्य पालन और भूजल रिचार्ज पर असर पड़ सकता है। ये इलाके पहले से ही जलवायु दबाव के प्रति संवेदनशील हैं।
चीन ने भारत की आशंका को किया खारिज
चीन ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि उसकी परियोजनाओं से नीचे की ओर के देशों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। वहीं, परियोजना के तकनीकी आकार को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। सीएनएन ने स्टिमसन सेंटर के विशेषज्ञ ब्रायन आइयलर के हवाले से कहा है कि यह अब तक की सबसे जटिल जलविद्युत परियोजना हो सकती है, लेकिन साथ ही यह सबसे जोखिम भरी परियोजनाओं में से एक भी है। भूकंप संभावित और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी तरह की तकनीकी चूक के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
भारत और चीन के बीच बांध निर्माण की होड़
मेकॉन्ग नदी पर चीन के बांधों को लेकर पहले भी नीचे की ओर बसे देशों ने आरोप लगाए हैं कि जल प्रवाह को बिजली उत्पादन के हिसाब से नियंत्रित कर सूखे की स्थिति को और खराब किया गया। इन घटनाक्रमों के बीच भारत की सबसे बड़ी सरकारी जलविद्युत कंपनी भी ब्रह्मपुत्र पर 11,200 मेगावाट की अपनी परियोजना को आगे बढ़ा रही है। इसके पीछे रणनीतिक और जल सुरक्षा से जुड़े कारण भी बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही नदी प्रणाली पर दोनों देशों की मेगा परियोजनाएं जोखिम को और बढ़ा सकती हैं। पारदर्शिता और आपसी सहयोग के बिना, भारत और चीन के बीच बांध निर्माण की होड़ न सिर्फ क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकती है, बल्कि ब्रह्मपुत्र नदी और उस पर निर्भर लाखों लोगों के भविष्य को भी खतरे में डाल सकती है।

