भारत केवल एक भौगोलिक इकाई अथवा राजनीतिक राष्ट्र नहीं है; वह सनातन सांस्कृतिक चेतना, सहस्राब्दियों से प्रवहमान जीवन्त सभ्यता और मानवता के आध्यात्मिक उत्कर्ष की दिव्य प्रयोगभूमि है। इस पुण्यभूमि ने संसार को वेदों का ज्ञान, उपनिषदों का आत्मबोध, भगवान श्रीराम की मर्यादा, भगवान श्रीकृष्ण का कर्मयोग, भगवान बुद्ध की करुणा, भगवान महावीर का अहिंसा-दर्शन और भगवत्पाद आदि शंकराचार्य का अद्वैतबोध प्रदान किया है। भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का मूल स्वर सत्ता नहीं, साधना है; विस्तार नहीं, विश्वबंधुत्व है; अधिकार नहीं, कर्तव्य है और शासन नहीं, लोकमंगल है।
इतिहास के प्रत्येक निर्णायक मोड़ पर भारत को ऐसे नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ है, जिसने केवल परिस्थितियों का संचालन नहीं किया, बल्कि राष्ट्र के अंतर्मन में सुप्त आत्मविश्वास को जाग्रत किया। वर्तमान युग में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी का नेतृत्व इसी राष्ट्रीय पुनर्जागरण का एक महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली अध्याय बनकर सामने आया है। उनके व्यक्तित्व में सेवा की संवेदना, संकल्प की दृढ़ता, साधक का अनुशासन, प्रशासक की दक्षता और राष्ट्रनायक की दूरदर्शिता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
भारतीय चिन्तन में श्रेष्ठ नेतृत्व के लिए “राजर्षि” शब्द का प्रयोग किया गया है। राजर्षि वह है, जिसके पास शासन का सामर्थ्य तो हो, किन्तु जिसकी चेतना ऋषित्व, संयम, नैतिकता और लोकमंगल से अनुप्राणित हो; जिसका अधिकार आत्मसंयम से, जिसकी नीति न्याय से और जिसकी शक्ति सेवा से अनुशासित हो।
17 सितम्बर को उनके जन्मदिवस के पावन अवसर पर उनका अभिनन्दन करना वस्तुतः उस कर्मनिष्ठ जीवन-दृष्टि का सम्मान करना है, जिसने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर राष्ट्रसेवा को प्रतिष्ठित किया है। उनका जीवन इस सत्य का साक्षात्कार कराता है कि जब संकल्प निजी महत्त्वाकांक्षा से ऊपर उठकर राष्ट्राराधना बन जाता है, तब एक सामान्य परिवेश से निकला हुआ व्यक्ति भी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व करते हुए युग-परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।
संघर्ष से शिखर तक की साधनामयी यात्रा –
17 सितम्बर, 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे श्री नरेन्द्र मोदी जी का जीवन प्रारम्भ से ही संघर्ष, आत्मनिर्भरता, अनुशासन और सेवाभाव से अनुप्राणित रहा। सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने संगठन, समाजसेवा और राष्ट्रकार्य के माध्यम से सार्वजनिक जीवन की दीर्घ यात्रा सम्पन्न की। यह यात्रा आकस्मिक उपलब्धियों की नहीं, अपितु अनेक दशकों की तपश्चर्या, पुरुषार्थ और निरंतर कर्मसाधना की यात्रा है।
07 अक्टूबर, 2001 को उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शासन का दायित्व ग्रहण किया। मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल प्रशासनिक नवाचार, आधारभूत संरचना, विद्युत्-व्यवस्था, कृषि-विकास, निवेश, जल-संरक्षण और औद्योगिक प्रगति के लिए विशेष रूप से चर्चित रहा। शासन को परिणामोन्मुख, उत्तरदायी और तकनीक-सक्षम बनाने की जिस कार्यपद्धति का विकास उन्होंने गुजरात में किया, वही आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर उनकी शासन-दृष्टि का आधार बनी।
वर्ष 2014 में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दायित्व ग्रहण किया। वर्ष 2019 के पश्चात् 09 जून, 2024 को उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस प्रकार वे पंडित जवाहरलाल नेहरू के पश्चात् लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने।
वर्ष 2026 उनके शासन-नेतृत्व की यात्रा में विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि अक्टूबर 2001 से आरम्भ हुई मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनकी यात्रा 25 वर्षों की निरन्तर जनसेवा का उल्लेखनीय सोपान पूर्ण कर रही है। इस अवसर पर 17 सितम्बर से 17 अक्टूबर तक प्रस्तावित “सेवा संकल्प अभियान” में रक्तदान, स्वच्छता, जनकल्याण, युवा सहभागिता और सेवा-कार्यों को प्रमुखता दी जा रही है। यह अत्यन्त अर्थपूर्ण है कि उनके जन्मदिवस का उत्सव व्यक्तिगत अभिनन्दन तक सीमित न रहकर समाजसेवा के व्यापक संकल्प में परिणत हो रहा है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी की जीवनचर्या में कठोर परिश्रम, समयानुशासन, योग-साधना, सात्त्विकता और निरन्तर सक्रियता प्रमुख रूप से दिखाई देती है। सार्वजनिक जीवन के अत्यधिक व्यस्त और दबावपूर्ण वातावरण में भी भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं, तीर्थों और साधना के प्रति उनका अनुराग उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है। वे शासन और साधना, आधुनिकता और परम्परा, विज्ञान और अध्यात्म तथा विकास और विरासत के मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न करते दिखाई देते हैं।
उनका उद्घोष – “राष्ट्र प्रथम” – मात्र राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि उनकी कार्यपद्धति का केन्द्रीय सूत्र है। उनके नेतृत्व में शासन को केवल योजनाओं और कार्यालयों तक सीमित न रखकर जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास हुआ। स्वच्छता हो अथवा जल-संरक्षण, बेटी बचाओ अभियान हो अथवा डिजिटल भुगतान, स्थानीय उत्पादों के प्रति आग्रह हो अथवा पर्यावरण-संरक्षण – उन्होंने अनेक राष्ट्रीय कार्यक्रमों को जनांदोलन का स्वरूप प्रदान करने का प्रयत्न किया।
अंत्योदय से राष्ट्रोदय की ओर –
भारतीय शासन-दर्शन का सर्वोच्च उद्देश्य समाज के अन्तिम व्यक्ति तक सुख, सुरक्षा, सम्मान और अवसर पहुँचाना है। महात्मा गाँधी का अन्तिम व्यक्ति सम्बन्धी चिन्तन और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय-दर्शन इसी लोकमंगलकारी भावना के आधुनिक प्रतिरूप हैं।
प्रधानमंत्री जनधन योजना के माध्यम से आर्थिक समावेशन, उज्ज्वला योजना द्वारा निर्धन परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ ईंधन, स्वच्छ भारत अभियान द्वारा स्वच्छता को राष्ट्रीय संस्कार, आयुष्मान भारत द्वारा स्वास्थ्य-सुरक्षा, प्रधानमंत्री आवास योजना द्वारा पक्के घर, जल जीवन मिशन द्वारा घरों तक नल से जल तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण द्वारा शासन की सहायता सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने के प्रयासों ने जनकल्याणकारी प्रशासन को नई गति प्रदान की।
इन योजनाओं का महत्त्व केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि उस मानवीय गरिमा में है, जो किसी निर्धन परिवार को अपना घर मिलने, किसी माता को धुएँ से मुक्ति मिलने, किसी रोगी को उपचार का संबल प्राप्त होने और किसी ग्रामीण परिवार को शुद्ध पेयजल उपलब्ध होने से जन्म लेती है। लोककल्याण तभी सार्थक होता है, जब नीति का लाभ नागरिक के दैनिक जीवन को स्पर्श करे।
महिलाओं के सम्मान और सहभागिता को “नारीशक्ति” के रूप में राष्ट्रीय विमर्श के केन्द्र में लाना, स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहन देना, “लखपति दीदी” की संकल्पना तथा विधायिकाओं में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए नारी शक्ति वन्दन अधिनियम जैसे निर्णय व्यापक सामाजिक परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण संकेतक हैं। किसी राष्ट्र की प्रगति तब तक पूर्ण नहीं हो सकती, जब तक उसकी मातृशक्ति सुरक्षित, शिक्षित, आत्मनिर्भर और निर्णय-प्रक्रिया में समान रूप से सहभागी न हो।
आधारभूत संरचना से नवभारत का निर्माण –
किसी भी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति केवल उसकी नीतियों से नहीं, बल्कि उसके मार्गों, रेलमार्गों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, ऊर्जा-संरचना, संचार-व्यवस्था और नगरीय सुविधाओं से भी निर्मित होती है। पिछले वर्षों में भारत ने आधारभूत संरचना के क्षेत्र में गति और विस्तार का एक नया युग देखा है।
राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे का विस्तार, सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों और सुरंगों का निर्माण, नए हवाई अड्डे, मेट्रो नेटवर्क का प्रसार, रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास, मालवाहक गलियारे, आधुनिक रेल संरचना और वन्दे भारत ट्रेनों का संचालन – ये सभी गतिशक्ति से युक्त भारत के प्रतीक हैं।
“प्रधानमंत्री गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान” ने विभिन्न मंत्रालयों और आधारभूत परियोजनाओं को एकीकृत दृष्टि से देखने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य केवल निर्माण की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि गति, समन्वय और समयबद्धता के माध्यम से देश की आर्थिक क्षमताओं को सुदृढ़ करना है।
यह परिवर्तन केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आकांक्षी जिलों, सीमावर्ती क्षेत्रों, पूर्वोत्तर भारत और ग्रामीण अंचलों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के सूत्र को व्यावहारिक धरातल प्रदान करता है। विकास तभी न्यायपूर्ण कहा जा सकता है, जब उसकी रोशनी उन दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचे, जो लम्बे समय तक सुविधाओं और अवसरों से वंचित रहे हैं।
डिजिटल भारत और नवाचार का नवयुग –
आज का भारत केवल प्राचीन ज्ञान का गौरवशाली उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार का समर्थ केन्द्र भी है। डिजिटल इंडिया, आधार-आधारित सेवाएँ, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस – यूपीआई – और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने शासन तथा दैनिक आर्थिक व्यवहार को व्यापक रूप से परिवर्तित किया है।
एक समय जिस भारत को तकनीकी क्रान्ति का अनुगामी माना जाता था, वही भारत आज डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का अपना अनुभव विश्व के साथ साझा कर रहा है। छोटे दुकानदार से लेकर ग्रामीण नागरिक तक डिजिटल भुगतान की पहुँच ने तकनीक को अभिजात वर्ग की सुविधा न रहने देकर जनसामान्य का साधन बनाया है। पारदर्शिता, सुगमता और तीव्रता से युक्त यह डिजिटल परिवर्तन प्रशासनिक संस्कृति में भी व्यापक बदलाव का माध्यम बना है।
स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा योजना, उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन, सेमीकंडक्टर निर्माण और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों ने उद्यमिता तथा विनिर्माण को नया प्रोत्साहन प्रदान किया। युवा केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि नवाचार करने वाले, उद्योग स्थापित करने वाले और रोजगार सृजित करने वाले राष्ट्रनिर्माता बनें – यह विकसित भारत की आधारभूत अपेक्षा है।
अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता, आदित्य-एल1, गगनयान की तैयारियाँ और निजी अंतरिक्ष-उद्योग के लिए खुलते अवसर भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास को अभिव्यक्त करते हैं। ये उपलब्धियाँ किसी एक सरकार अथवा संस्थान की सीमा से ऊपर उठकर भारतीय वैज्ञानिकों, अभियंताओं और युवाओं के सामूहिक पुरुषार्थ की विजय हैं; किन्तु उन्हें दी गई नीतिगत प्राथमिकता और राष्ट्रीय प्रोत्साहन ने इस यात्रा को निश्चित रूप से नई गति प्रदान की है।
आत्मनिर्भरता और सामरिक सामर्थ्य –
विश्व में शान्ति की स्थापना वही राष्ट्र प्रभावी ढंग से कर सकता है, जो स्वयं सुरक्षित, समर्थ और आत्मनिर्भर हो। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में रक्षा-उत्पादन, सीमावर्ती आधारभूत संरचना, स्वदेशी सैन्य तकनीक तथा रणनीतिक साझेदारियों पर विशेष बल दिया गया है।
“आत्मनिर्भर भारत” का आशय संसार से विमुख होना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को इतना समर्थ बनाना है कि भारत वैश्विक सहयोग में समानता, आत्मविश्वास और स्वाभिमान के साथ सहभागी हो। रक्षा-सामग्री के स्वदेशी निर्माण, नौसेना की क्षमता, मिसाइल प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष-आधारित सामरिक क्षमताओं का विकास इसी व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा-दृष्टि का अंग है।
आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद के प्रति दृढ़ नीति, सीमाओं की सुरक्षा तथा संकटों के समय भारतीय नागरिकों को विदेशों से सुरक्षित निकालने के अभियानों ने यह सन्देश दिया कि भारत अपने प्रत्येक नागरिक की रक्षा और सम्मान के प्रति सजग है। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि नागरिकों के मन में विश्वास और निर्भयता उत्पन्न करने का भी माध्यम है।
आर्थिक सामर्थ्य और विकसित भारत का संकल्प –
भारत की आर्थिक यात्रा में पिछले वर्षों के दौरान अनेक संरचनात्मक परिवर्तन हुए हैं। वस्तु एवं सेवा कर, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, बैंकिंग सुधार, डिजिटल कर-व्यवस्था, आधारभूत संरचना में पूँजीगत निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों ने औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार की दिशा में योगदान किया है।
वैश्विक महामारी, भू-राजनीतिक संघर्षों, ऊर्जा-संकट और आपूर्ति-श्रृंखला की बाधाओं के बीच भारत ने आर्थिक स्थिरता तथा विकास की गति बनाए रखने का प्रयास किया। आज भारत प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी स्थान रखता है और आने वाले वर्षों में उसके आर्थिक आकार तथा वैश्विक योगदान में और वृद्धि की व्यापक संभावनाएँ हैं।
परन्तु विकसित भारत का वास्तविक अर्थ केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि नहीं है। विकसित भारत वह होगा, जहाँ समृद्धि के साथ संवेदना, तकनीक के साथ मानवीयता, नगरों के साथ गाँवों की उन्नति, उद्योग के साथ पर्यावरण-संतुलन और अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध भी सुदृढ़ हो। प्रधानमंत्री जी द्वारा वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प इसी सर्वांगीण राष्ट्रीय उत्कर्ष की आकांक्षा को स्वर प्रदान करता है।
विकास तभी मंगलकारी है, जब वह मनुष्य को केवल उपभोक्ता न बनाए, बल्कि उसे उत्तरदायी नागरिक भी बनाए। अर्थव्यवस्था की शक्ति का अन्तिम उद्देश्य समाज में न्याय, अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और आत्मनिर्भरता का विस्तार होना चाहिए। विकसित भारत का संकल्प वस्तुतः आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक चेतना के संतुलित समन्वय का संकल्प है।
विकास भी, विरासत भी –
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व की एक अत्यंत विशिष्ट विशेषता यह है कि उन्होंने विकास और सांस्कृतिक विरासत को परस्पर विरोधी मानने वाली मानसिकता को चुनौती दी है। उनके चिन्तन में आधुनिक भारत अपनी जड़ों से जुड़कर ही विश्व का नेतृत्व कर सकता है।
अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मन्दिर का निर्माण और 22 जनवरी, 2024 को श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा करोड़ों भारतीयों की शताब्दियों पुरानी आस्था की ऐतिहासिक परिणति बनी। प्रधानमंत्री जी ने इस अवसर पर केवल अनुष्ठान में सहभागिता ही नहीं की, बल्कि मन्दिर-निर्माण में योगदान देने वाले श्रमजीवियों का सम्मान भी किया।
काशी विश्वनाथ धाम का पुनरुद्धार, उज्जैन का श्रीमहाकाल महालोक, केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण, तीर्थक्षेत्रों का विकास तथा सोमनाथ और अन्य पवित्र स्थलों के प्रति विशेष अनुराग – ये सभी सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महत्त्वपूर्ण प्रतीक हैं। भारतीय पुरावशेषों की विदेशों से स्वदेश वापसी और योग, आयुर्वेद तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाने के प्रयासों ने भारत की सभ्यतागत चेतना को नया आत्मविश्वास प्रदान किया है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को “अंतरराष्ट्रीय योग दिवस” घोषित किया जाना भारत की प्राचीन योगविद्या की वैश्विक स्वीकृति का ऐतिहासिक क्षण था। आज योग केवल शारीरिक व्यायाम के रूप में नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और चेतना के सामंजस्य की भारतीय जीवनपद्धति के रूप में विश्वभर में प्रतिष्ठित हुआ है।
“विकास भी, विरासत भी” का सूत्र हमें स्मरण कराता है कि जो राष्ट्र अपनी जड़ों से कट जाता है, वह दीर्घकाल तक अपनी मौलिकता सुरक्षित नहीं रख सकता। भारत की आधुनिकता पश्चिमीकरण का पर्याय नहीं, बल्कि अपनी सनातन आत्मा के आलोक में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और प्रगति को आत्मसात करने की प्रक्रिया है।
विश्वमंच पर भारत की सशक्त वाणी –
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता, विश्वबंधुत्व और व्यावहारिक कूटनीति का समन्वय दिखाई देता है। भारत ने एक ओर विश्व की प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंध सुदृढ़ किए, तो दूसरी ओर वैश्विक दक्षिण – ग्लोबल साउथ – की आकांक्षाओं को प्रभावी स्वर प्रदान किया।
वर्ष 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता अत्यन्त सफल और ऐतिहासिक सिद्ध हुई। “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” का ध्येयवाक्य उपनिषदों की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का वैश्विक उद्घोष था। नई दिल्ली घोषणा पर सर्वसम्मति बनना और अफ्रीकी संघ को जी-20 के स्थायी सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जाना भारत की समावेशी कूटनीतिक दृष्टि की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ थीं।
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन, वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन तथा पर्यावरण-सम्मत जीवनशैली के लिए “मिशन लाइफ” जैसी पहलें यह दर्शाती हैं कि भारत विश्व की समस्याओं पर केवल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि समाधान प्रस्तुत करने का भी सामर्थ्य रखता है।
यूक्रेन संकट के संदर्भ में प्रधानमंत्री जी का संदेश – “आज का युग युद्ध का नहीं है” – भारत की उस सनातन दृष्टि की अभिव्यक्ति है, जिसमें संवाद, सहअस्तित्व और शांति को सर्वोपरि माना गया है। भारत किसी एक शक्ति-गुट का अनुचर बनने के स्थान पर अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक कल्याण के अनुरूप स्वतंत्र दृष्टिकोण रखने वाले राष्ट्र के रूप में सामने आया है।
विश्व के अनेक देशों ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को अपने सर्वोच्च अथवा प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया है। ये सम्मान उनके व्यक्तिगत नेतृत्व के अभिनंदन के साथ-साथ भारत की बढ़ती आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक प्रतिष्ठा के भी प्रतीक हैं।
भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ उनका आत्मीय संवाद भारत और विश्व के मध्य एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु बना है। विदेशों में आयोजित उनके कार्यक्रम केवल राजनीतिक सभाएँ नहीं होते, बल्कि वे भारतीयता, सांस्कृतिक गौरव और मातृभूमि के प्रति अनुराग के विराट उत्सव का रूप धारण कर लेते हैं।
जनसंवाद की अभिनव शैली –
“मन की बात” के माध्यम से प्रधानमंत्री जी ने शासन और जनसामान्य के मध्य संवाद की एक अभिनव परम्परा विकसित की। इस संवाद में वे प्रायः ऐसे सामान्य नागरिकों, शिक्षकों, किसानों, कलाकारों, स्वच्छता-सेवियों, पर्यावरण-रक्षकों और नवप्रवर्तकों का उल्लेख करते हैं, जिनके छोटे-छोटे प्रयास राष्ट्र के लिए बड़ी प्रेरणा बनते हैं।
यह नेतृत्व की महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि वह केवल स्वयं प्रकाश में न रहे, बल्कि समाज के अनाम सत्कर्मियों पर भी प्रकाश डाले। इससे जनमानस में यह भाव जाग्रत होता है कि राष्ट्रनिर्माण केवल सरकार का कार्य नहीं; प्रत्येक नागरिक अपने आचरण, पुरुषार्थ और कर्तव्यपरायणता से उसका सहभागी है।
“परीक्षा पे चर्चा” के माध्यम से विद्यार्थियों के साथ संवाद, खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन, सैनिकों के साथ दीपावली और आपदाओं के समय नागरिकों के मध्य उपस्थिति – ये सभी उनके नेतृत्व के मानवीय तथा संवादशील पक्ष को प्रकट करते हैं। नेतृत्व का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब नागरिक शासक को दूरस्थ सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अपने सुख-दुःख में सहभागी संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में अनुभव करें।
कर्मयोग का जीवंत प्रतिमान –
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परं आप्नोति पूरुषः ।।
अर्थात् आसक्तिरहित होकर निरन्तर कर्तव्य-कर्म का पालन करना चाहिए; क्योंकि निष्काम भाव से कर्म करते हुए मनुष्य परम उत्कर्ष को प्राप्त करता है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी का सार्वजनिक जीवन निरंतर कर्मशीलता, लक्ष्यनिष्ठा और राष्ट्रसमर्पण का उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने राजनीति को केवल पद-प्राप्ति का माध्यम न मानकर उसे सेवा, उत्तरदायित्व और राष्ट्रनिर्माण की साधना के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति उनका अटूट आत्मविश्वास और कठिन से कठिन लक्ष्य को जनसंकल्प में परिणत करने की क्षमता है।
उनकी लोकप्रियता का आधार केवल वक्तृत्व अथवा राजनीतिक कौशल नहीं, बल्कि जनमानस की आकांक्षाओं को समझने, उन्हें राष्ट्रीय संकल्प का स्वर देने और परिणाम के लिए अनवरत परिश्रम करने की क्षमता भी है। वे चुनौती को अवसर, संकट को संकल्प और संकल्प को सिद्धि में बदलने का संदेश देते हैं।
भारतीय अध्यात्म में कर्मयोग का अर्थ केवल निरंतर कार्य करते रहना नहीं है। कर्मयोग वह अवस्था है, जिसमें व्यक्ति अपने कर्म को अहंकार, स्वार्थ और व्यक्तिगत फलाकांक्षा से ऊपर उठाकर व्यापक लोकमंगल के लिए समर्पित कर देता है। जब राष्ट्रसेवा साधना बन जाए, कर्तव्य पूजा बन जाए और जनकल्याण आराधना बन जाए, तब सार्वजनिक जीवन भी अध्यात्म की अभिव्यक्ति बन सकता है।
सेवा ही जन्मदिवस का श्रेष्ठ उत्सव –
महापुरुषों और लोकसेवकों के जन्मदिवस का श्रेष्ठ उत्सव पुष्प, अभिनंदन और समारोह मात्र नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को कर्म में परिणत करना है। अतः प्रधानमंत्री जी के जन्मदिवस पर आयोजित रक्तदान, स्वास्थ्य-जाँच, स्वच्छता, पर्यावरण-संरक्षण, दिव्यांग सहायता, जनसेवा और युवा-जागरण के अभियान उनकी कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि के अनुरूप हैं।
सेवा का अर्थ केवल किसी की तात्कालिक सहायता करना नहीं; सेवा का वास्तविक अर्थ है – दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझना, उसके सम्मान की रक्षा करना और उसे आत्मनिर्भर बनने का सामर्थ्य प्रदान करना। भारतीय संस्कृति में सेवा दया नहीं, आत्मीयता है; उपकार नहीं, कर्तव्य है; प्रदर्शन नहीं, समर्पण है।
यदि इस जन्मदिवस पर प्रत्येक नागरिक एक सेवा-संकल्प ग्रहण करे – एक वृक्ष लगाए, किसी निर्धन विद्यार्थी की सहायता करे, रक्तदान करे, जल बचाए, स्वदेशी उत्पाद अपनाए अथवा अपने परिवेश को स्वच्छ बनाए – तो यह अवसर राष्ट्राराधना के महोत्सव में परिणत हो सकता है। राष्ट्र के प्रति प्रेम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अनुशासन, ईमानदारी, परिश्रम, पर्यावरण-संरक्षण और सामाजिक संवेदनशीलता से प्रमाणित होता है।
नवभारत के उत्कर्ष का अभिनंदन !
आज भारत विकसित भारत के विराट संकल्प की दिशा में तीव्र गति से अग्रसर है। यह यात्रा केवल सरकार की नहीं, एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों के सामूहिक पुरुषार्थ की यात्रा है। इस यात्रा को स्पष्ट दिशा, आत्मविश्वास और वैश्विक अभिव्यक्ति प्रदान करने में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
उनके नेतृत्व में भारत ने अपनी सांस्कृतिक स्मृति को पुनः जाग्रत किया, विकास की गति को तीव्र बनाया, विज्ञान और तकनीक को जनसुलभ किया, राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ किया तथा विश्वमंच पर आत्मविश्वासपूर्ण वाणी प्राप्त की। आज भारत अपनी विरासत पर गौरव करते हुए आधुनिकता को आत्मसात कर रहा है; अपनी आध्यात्मिक चेतना को सुरक्षित रखते हुए विज्ञान और नवाचार में आगे बढ़ रहा है तथा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए विश्वकल्याण का उद्घोष कर रहा है।
भारत की शक्ति उसकी विविधता, लोकतांत्रिक चेतना, आध्यात्मिक दृष्टि और युवा सामर्थ्य में निहित है। इन समस्त शक्तियों को एक साझा राष्ट्रीय संकल्प से जोड़ना ही युगीन नेतृत्व का सबसे बड़ा दायित्व है। जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का स्मरण करेंगे, युवा अपनी प्रतिभा को राष्ट्रनिर्माण में लगाएंगे, महिलाएँ विकास की समान सहभागी बनेंगी और शासन सेवा का माध्यम बनेगा, तभी विकसित भारत का संकल्प पूर्णता प्राप्त करेगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के जन्मदिवस पर हमारा यह मंगल-संकल्प हो कि भारत समृद्ध हो, समर्थ हो, सुरक्षित हो, स्वावलंबी हो और अपनी सनातन आत्मा के आलोक में विश्व को शांति, सहअस्तित्व एवं मानव-कल्याण का मार्ग दिखाए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व, निर्णय-सामर्थ्य, अविराम कर्मयोग और “राष्ट्र प्रथम” की भावना का हृदय से अभिनंदन। भगवान मृत्युंजय महादेव और माँ भारती की कृपा से उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, अक्षय ऊर्जा तथा राष्ट्रसेवा के लिए निरंतर सामर्थ्य प्राप्त हो। उनका जीवन भारत के उत्कर्ष, मानवता के कल्याण और विश्वशांति के संकल्पों को नई सिद्धियाँ प्रदान करता रहे।

